टाटा समूह में चेयरमैन पद को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। Tata Sons के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया है। हालांकि, Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया। बोर्ड में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव के पक्ष में चार निदेशकों ने मतदान किया, जबकि नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट दिया।
अगस्त में चंद्रशेखरन ने खुद पद छोड़ने की बात कही थी
इस पूरे विवाद की शुरुआत अगस्त 2026 में हुई थी। 12 अगस्त को चंद्रशेखरन ने Tata Sons के बोर्ड को बताया था कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल के समाप्त होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था।
इसके बाद Tata Trusts ने उनके फैसले को स्वीकार करते हुए नए चेयरमैन के चयन के लिए प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी। लेकिन सितंबर में Tata Sons के बोर्ड ने चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। उन्होंने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और बोर्ड ने उन्हें अगले पांच साल के लिए दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव मंजूर कर दिया।
नोएल टाटा ने क्यों जताई आपत्ति?
नोएल टाटा का कहना है कि चंद्रशेखरन का पद छोड़ने का फैसला पहले ही सार्वजनिक हो चुका था और Tata Trusts ने उसे स्वीकार भी कर लिया था। उनके मुताबिक, कंपनी के कर्मचारियों, कर्जदाताओं, कारोबारी साझेदारों, बाजार और सबसे बड़े शेयरधारक ने भी इसी आधार पर आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। ऐसे में बाद में उस फैसले को पलटने पर उन्होंने सवाल उठाया।
नोएल टाटा की आपत्ति Tata Sons को सूचीबद्ध करने के मुद्दे से भी जुड़ी है। रिपोर्टों के मुताबिक, वह कंपनी को निजी बनाए रखने के विकल्पों पर जोर देते रहे हैं, जबकि Tata Sons के बोर्ड ने RBI के नियामकीय ढांचे के मद्देनजर कंपनी की संभावित लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने का फैसला किया है।
Tata Trusts के पास करीब 66% हिस्सेदारी
Tata Trusts की Tata Sons में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसी वजह से कंपनी के चेयरमैन और बोर्ड से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में Trusts की भूमिका अहम है। मौजूदा विवाद में भी यही हिस्सेदारी और Tata Sons के Articles of Association चर्चा के केंद्र में हैं।
Tata Trusts ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव कानूनी रूप से वैध नहीं था। Trusts के अनुसार, चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए Trust nominee directors के समर्थन से जुड़ी शर्तें पूरी होना जरूरी है। वहीं Tata Sons बोर्ड ने बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दी है।
अब आगे क्या होगा?
चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उनका Tata Sons के निदेशक के रूप में बने रहना भी आगामी शेयरधारक बैठक में महत्वपूर्ण होगा। रिपोर्टों के अनुसार, उनकी निदेशक के तौर पर पुनर्नियुक्ति के लिए शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होगी। ऐसे में Tata Sons की अगली AGM इस विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण बन सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल दो प्रमुख मुद्दे सामने हैं—चंद्रशेखरन के नेतृत्व को लेकर Tata Trusts और Tata Sons बोर्ड के बीच मतभेद तथा Tata Sons के भविष्य के ढांचे और संभावित लिस्टिंग को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण। दोनों पक्षों की स्थिति आने वाले कॉरपोरेट और शेयरधारक फैसलों से और स्पष्ट हो सकती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

