नगर निगम सिंगरौली के गोस्वामी का पूरा सच क्या? नियुक्ति से पदोन्नति और विभागीय कार्यों तक केवल सवाल? वर्षों से जांच और कार्रवाई का इंतजार

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सिंगरौली। नगर पालिक निगम सिंगरौली के विद्युत विभाग में उपयंत्री के पद पर कार्यरत प्रवीण कुमार गोस्वामी से जुड़ा मामला पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में है। उनकी प्रारंभिक नियुक्ति, वर्ष 2013 में हुई पदोन्नति, विभागीय दस्तावेजों, शिकायतों, कथित फर्जी लेटर पैड प्रकरण, कुछ निर्माण एवं विद्युत कार्यों से जुड़े सवाल और लंबे समय से लंबित जांच को लेकर अलग-अलग समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। इन सभी मामलों को लेकर “गोस्वामी श्रृंखला” के तहत प्रकाशित खबरों में उपलब्ध दस्तावेजों, शिकायतों और सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा गया है। अब तक सामने आए तथ्यों को एक साथ देखने पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रवीण कुमार गोस्वामी की नियुक्ति से लेकर पदोन्नति और बाद की विभागीय भूमिका से जुड़े मामलों की अंतिम जांच कब होगी और उसका निष्कर्ष सार्वजनिक कब होगा।

समयपाल पद पर नियुक्ति से शुरू हुई कहानी

सूत्रों के अनुसार प्रवीण कुमार गोस्वामी की प्रारंभिक नियुक्ति नगर निगम में समयपाल के पद पर हुई थी। उपलब्ध शिकायतों में इस नियुक्ति की योग्यता और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से यह दावा किया गया कि समयपाल पद पर नियुक्ति के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता में हायर सेकेंडरी स्तर पर गणित विषय की आवश्यकता थी, जबकि गोस्वामी के संबंध में हायर सेकेंडरी में जीव विज्ञान विषय होने की बात कही गई है। इसी आधार पर उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की वैधता की जांच की मांग की गई। इस मामले में मध्यप्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग के 30 अगस्त 1993 के परिपत्र का भी उल्लेख शिकायतों में किया गया। शिकायत में यह सवाल उठाया गया कि यदि नियुक्ति के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता पूरी नहीं होती थी तो नियुक्ति के अभिलेखों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की गई। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि नियुक्ति के समय प्रस्तुत मूल शैक्षणिक प्रमाण-पत्र, चयन प्रक्रिया, पद की योग्यता और संबंधित नियुक्ति आदेश की जांच आवश्यक मानी जा रही है।

2013 की पदोन्नति बनाम सवाल

गोस्वामी प्रकरण में सबसे अधिक चर्चा वर्ष 2013 की विभागीय पदोन्नति को लेकर हो रही है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार आयुक्त, नगर पालिक निगम सिंगरौली के आदेश क्रमांक 13302/स्था./2013 दिनांक 17 जनवरी 2013 के तहत तत्कालीन उपायुक्त सी.पी. पाण्डेय की अध्यक्षता में विभागीय पदोन्नति समिति गठित की गई थी। समिति की बैठक 28 फरवरी 2013 को हुई और इसके बाद कार्यालयीन आदेश क्रमांक 15071-15072/स्था./2013 दिनांक 7 मार्च 2013 के माध्यम से उस समय समयपाल के पद पर कार्यरत प्रवीण कुमार गोस्वामी को उपयंत्री पद पर पदोन्नत किए जाने का उल्लेख उपलब्ध अभिलेखों में मिलता है। यहीं से पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर कई सवाल सामने आए। मध्यप्रदेश नगरपालिका निगम अधिकारियों तथा सेवकों की नियुक्ति एवं सेवा की शर्तों से जुड़े नियमों और बाद में जारी अधिसूचनाओं के संदर्भ में शिकायतकर्ताओं ने पदोन्नति को लेकर सवाल उठाए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उपयंत्री पद के लिए संबंधित तकनीकी योग्यता और पदोन्नति के लिए निर्धारित कोटे की व्यवस्था भी लागू थी।

16 स्वीकृत पद और 5 प्रतिशत पदोन्नति का सवाल

सूत्रों से प्राप्त जानकारी में सामना आया कि विभागीय पदोन्नति समिति के कार्यवृत्त में नगर निगम सिंगरौली में उपयंत्री के कुल 16 स्वीकृत पद होने का उल्लेख सामने आया। शिकायतकर्ता का तर्क है कि यदि कुल स्वीकृत पदों में विभागीय पदोन्नति के लिए 5 प्रतिशत कोटा लागू किया जाए तो पदोन्नति के लिए केवल एक पद का प्रावधान बनता है। दूसरी ओर उपलब्ध आरक्षण रोस्टर से संबंधित जानकारी को लेकर सूत्रों का दावा है कि 28 फरवरी 2013 की स्थिति में पदोन्नति कोटे के विरुद्ध दो कर्मचारी पहले से उपयंत्री पद पर कार्यरत बताए गए थे। इनमें रामनरेश शाह और पवन कुमार सिंह के नाम का उल्लेख किया जाता है। यदि संबंधित अभिलेख सही पाए जाते हैं तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि वर्ष 2013 में प्रवीण कुमार गोस्वामी को पदोन्नति देने के लिए पद की उपलब्धता और पदोन्नति कोटे की स्थिति क्या थी? इसी बिंदु पर निष्पक्ष जांच की मांग लगातार उठती रही है।

पदोन्नति समिति और तत्कालीन अधिकारी की भूमिका

गोस्वामी की पदोन्नति के समय विभागीय पदोन्नति समिति की अध्यक्षता तत्कालीन उपायुक्त सी.पी. पाण्डेय द्वारा किए जाने का उल्लेख उपलब्ध दस्तावेजों में मिलता है। आपको ज्ञात हो कि यह भी सामने आया था कि गोस्वामी के पदोन्नति के बाद के वर्षों में सी.पी. पाण्डेय के कार्यकाल से जुड़े अलग मामले में लोकायुक्त की कार्रवाई हुई थी। इसी आधार पर शिकायतकर्ता और सूत्रों की ओर से यह मांग उठाई गई कि वर्ष 2013 में उनके कार्यकाल में हुई पदोन्नति प्रक्रिया के दस्तावेजों की भी स्वतंत्र जांच की जाए। तर्क यही था कि जिसने गोस्वामी को पदोन्नति दिया वही खुद अपने नौकरी के आखिरी वर्ष में भ्रष्टाचार के मामले में लोकायुक्त के हत्थे चढ़ गया था। हालांकि किसी अधिकारी के विरुद्ध बाद की किसी कार्रवाई को अपने आप किसी अन्य पुराने निर्णय में अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए पदोन्नति से संबंधित वास्तविक स्थिति विभागीय रिकॉर्ड और सक्षम जांच से ही स्पष्ट हो सकती है।

चरित्र प्रमाण-पत्र विवाद

पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों में एक चरित्र प्रमाण-पत्र को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। सूत्रों के अनुसार शिकायतकर्ता ने दावा किया कि पदोन्नति के दौरान प्रस्तुत चरित्र प्रमाण-पत्र की लिखावट को लेकर संदेह है और इसे स्वयं प्रवीण कुमार गोस्वामी द्वारा लिखे जाने की बात कही गई। इस दावे की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में मूल प्रमाण-पत्र, उसके जारीकर्ता अधिकारी, हस्ताक्षर और कार्यालयीन रिकॉर्ड की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकता है कि दस्तावेज नियमानुसार जारी हुआ था या नहीं।

महापौर के कथित फर्जी लेटर पैड का मामला

गोस्वामी की एक महत्वपूर्ण कड़ी में नगर निगम की तत्कालीन महापौर रानी अग्रवाल के नाम से कथित फर्जी लेटर पैड और हस्ताक्षर से जुड़े मामले का भी उल्लेख भी सूत्रों से सामने आता है। बताया जा रहा है कि महापौर के नाम से कथित फर्जी हस्ताक्षर वाला शिकायत पत्र वरिष्ठ अधिकारियों तक भेजे जाने के बाद इस मामले ने तुल पकड़ी और मीडिया हेडलाइन बना। इस संबंध में कोतवाली बैढ़न में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। सूत्रों के अनुसार इस प्रकरण की जांच के दौरान एक पीसीओ/कोरियर सेंटर से जुड़ी तस्वीर, कथित लिफाफे और सीसीटीवी से संबंधित दावे भी सामने आए थे।  इसी मामले में प्रवीण कुमार गोस्वामी का नाम भी चर्चाओं में आने की बात पूर्व रिपोर्टों में सामने आई थी, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जाना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति का नाम जांच या शिकायत में चर्चा में आना उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं है।

शिकायतों का सिलसिला और विभागीय पत्राचार

गोस्वामी से संबंधित मामला केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रहा। सूत्रों के अनुसार पिछले वर्षों में उनकी नियुक्ति, पदोन्नति, कथित दस्तावेजी अनियमितताओं और आय से अधिक संपत्ति सहित अलग-अलग बिंदुओं को लेकर शिकायतें विभिन्न स्तरों पर भेजी जाती रही हैं। नगर निगम स्तर से कलेक्टर और नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग तक पत्राचार किए जाने की बात भी सामने आई है। कुछ शिकायतों के संबंध में जांच प्रतिवेदन भेजे जाने का उल्लेख भी उपलब्ध पत्राचार में बताया गया है। इसके बावजूद शिकायतों पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

15 जून 2025 के पत्र ने फिर बढ़ाए सवाल

सूत्रों के अनुसार 15 जून 2025 को जारी एक पत्र में प्रवीण कुमार गोस्वामी से संबंधित शिकायतों की जांच नगर पालिक निगम सिंगरौली के आयुक्त को सौंपे जाने तथा जांच के बाद यथोचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। अब मुख्य सवाल यह है कि

  • उस पत्र के आधार पर जांच कहां तक पहुंची?
  • क्या जांच पूरी हुई?
  • क्या जांच रिपोर्ट तैयार हुई?
  • क्या शिकायतों में लगाए गए आरोप सही पाए गए?
  • क्या उन्हें निराधार माना गया?
  • यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?
  • और यदि जांच अभी लंबित है तो इसकी वजह क्या है?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है।

30 अगस्त 1993 के शासन परिपत्र का भी हवाला

गोस्वामी से जुड़ी अगली कड़ी में एक शिकायत में मध्यप्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग के 30 अगस्त 1993 के परिपत्र क्रमांक सी/3-22/93/3/1 का उल्लेख किया गया था।शिकायत में दावा किया गया कि यदि किसी शासकीय सेवक की प्रारंभिक नियुक्ति के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता पूरी नहीं थी अथवा नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों में कोई गंभीर अनियमितता थी, तो संबंधित अभिलेखों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए थी। इसी आधार पर शिकायत में प्रवीण कुमार गोस्वामी की नियुक्ति और बाद की पदोन्नति से संबंधित अभिलेखों की जांच की मांग की गई थी। शिकायत में तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

अब सामने आया टाइमकीपर नियुक्ति का पुराना अध्याय

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2002 में टाइमकीपर पद पर नियुक्ति और उस समय निर्धारित योग्यता तथा चयन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से नियुक्ति संबंधी मूल अभिलेख, योग्यता प्रमाण-पत्र और चयन प्रक्रिया की जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है। यही मामला आगे चलकर वर्ष 2013 की पदोन्नति से भी जुड़ता है। यदि प्रारंभिक नियुक्ति की प्रक्रिया में कोई कमी थी तो बाद की पदोन्नति पर उसका प्रभाव क्या पड़ा, यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। इसलिए नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक पूरे सेवा रिकॉर्ड की एक साथ जांच किए जाने की मांग सामने आती रही है।

एक तरफ शिकायतें, दूसरी तरफ वर्षों से लंबित जांच

गोस्वामी प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग बिंदुओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में पूरे मामले का कोई ऐसा समेकित अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है जिससे सभी सवालों का एक साथ जवाब मिल सके। कहीं नियुक्ति की योग्यता का सवाल है, कहीं पदोन्नति के लिए पद उपलब्ध होने का प्रश्न है, कहीं आरक्षण रोस्टर का मुद्दा है, कहीं चरित्र प्रमाण-पत्र की सत्यता पर सवाल हैं, तो कहीं कथित फर्जी लेटर पैड और विभागीय कार्यों से जुड़े आरोप। इन सभी मामलों को अलग-अलग देखने के बजाय यदि नगर निगम प्रशासन मूल सेवा पुस्तिका, नियुक्ति आदेश, शैक्षणिक प्रमाण-पत्र, विभागीय पदोन्नति समिति के कार्यवृत्त, आरक्षण रोस्टर, पद संरचना, चरित्र प्रमाण-पत्र, संबंधित कार्यादेश और भुगतान रिकॉर्ड की एक साथ जांच कराए तो मामले की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

जांच कब और कौन करेगा?

सूत्रों का कहना है कि लंबे समय से चल रही शिकायतों के कारण अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की आवश्यकता है। जांच में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को शामिल किए जाने की जरूरत बताई जा रही है—

  •  वर्ष 2002 में टाइमकीपर पद पर नियुक्ति के समय निर्धारित योग्यता क्या थी?
  • प्रवीण कुमार गोस्वामी की नियुक्ति के समय प्रस्तुत मूल प्रमाण-पत्रों की स्थिति क्या थी?
  • वर्ष 2013 में उपयंत्री पद पर पदोन्नति के समय कितने पद स्वीकृत और रिक्त थे?
  • विभागीय पदोन्नति के 5 प्रतिशत कोटे की वास्तविक स्थिति क्या थी?
  • 28 फरवरी 2013 की पदोन्नति समिति की बैठक के कार्यवृत्त और आरक्षण रोस्टर में क्या स्थिति दर्ज थी?
  • पदोन्नति में प्रस्तुत चरित्र प्रमाण-पत्र किस अधिकारी द्वारा जारी किया गया था?
  • कथित फर्जी लेटर पैड और हस्ताक्षर मामले की पुलिस जांच का वर्तमान निष्कर्ष क्या है?
  • जून 2025 के पत्र के आधार पर की गई जांच का परिणाम क्या रहा?
  • पूर्व में भेजे गए जांच प्रतिवेदनों पर विभागीय स्तर पर क्या निर्णय लिया गया?

पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि शिकायतों और आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के माध्यम से संबंधित अधिकारी को पूरी तरह क्लीन चिट मिलनी चाहिए। वहीं यदि किसी दस्तावेज या प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है।

सूत्रों के अनुसार नगर निगम और नगरीय प्रशासन विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वर्षों से उठते रहे इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के आधार पर दिया जाए। प्रवीण कुमार गोस्वामी की नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक की पूरी प्रक्रिया यदि नियमों के अनुसार हुई है तो संबंधित अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। दूसरी ओर यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा।फिलहाल गोस्वामी प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि वर्षों से उठते रहे सवालों का दस्तावेजी और निष्पक्ष जवाब सामने आना है।

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