आंगन में बह रही गंगा, 40 साल में 3 बार उजड़े आशियाने! भागलपुर के राघोपुर तटबंध खाली करने का अल्टीमेटम

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जिस आंगन में कुछ दिन पहले तक बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और गृहस्थी की चहल-पहल थी, आज वहां गंगा की उफनती धारा कलकल कर बह रही है। बेबस इंसान और चारों तरफ फैला अथाह पानी— गंगा के रौद्र रूप ने भागलपुर के राघोपुर इलाके का भूगोल ही बदलकर रख दिया है। सोमवार सुबह करीब नौ बजे राघोपुर तटबंध पर बसे 200 से अधिक परिवारों के बीच केवल अफरातफरी, लाचारी और गहरा खौफ नजर आ रहा था।

प्रशासन द्वारा सोमवार शाम सात बजे तक तटबंध को खाली करने की सख्त चेतावनी जारी की गई थी। सिर पर गृहस्थी का जरूरी सामान और आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए विस्थापितों के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि अब लौटकर कहां जाएंगे? क्योंकि जो जमीन नदी की अथाह गहराई में समा चुकी है, वह कभी लौटकर नहीं आएगी।अपने ढहते आशियाने को देख फफक रहीं मंजू देवी गंगा मैया से बार-बार रहम की भीख मांग रही थीं। राघोपुर जमींदारी बांध का आधा किलोमीटर से अधिक हिस्सा गंगा के गर्भ में समा चुका है, जिससे 200 परिवारों का वजूद एक झटके में उजड़ गया है।

40 साल में बदलते रहे पते: नाथनगर के वोटर अब खरीक में बेगाने

यह त्रासदी केवल एक दिन की नहीं, बल्कि पिछले चार दशकों से जारी विस्थापन की अंतहीन पीड़ा है। बीते 40 वर्षों में नाथनगर प्रखंड के शंकरपुर चौवनियां, शंकरपुर, लोदीपुर, फरीदपुर, ननकार, काजी कोरिया, अलालपुर, राघोपुर और नवादा जैसी घनी बस्तियां गंगा के कटाव की भेंट चढ़ चुकी हैं।

कटाव पीड़ित प्रमोद यादव अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं, “जिस जमीन पर हमारी कई पीढ़ियां पली-बढ़ीं, उसका नामोनिशान तक नहीं बचा। 30 साल पहले हम नाथनगर प्रखंड के शंकरपुर चौवनियां के खुशहाल बाशिंदे थे। खेत, खलिहान, घर और सम्मानजनक जिंदगी थी।

नाथनगर की वोटर लिस्ट में नाम और राशन कार्ड था। जब गांव डूबा, तो 600 परिवारों ने पलायन कर खरीक प्रखंड में शरण ली। सब खोकर राघोपुर तटबंध पर झोपड़ी बनाई, अब यहां से भी भगाए जा रहे हैं। पुनर्वास की कोई बात नहीं करता। हम रिंग बांध, ईंट भट्ठों और 14 नंबर सड़क पर लाचार शरणार्थी बनकर रह गए हैं।”

30 बीघा के मालिक थे, आज बन गए फकीर

तटबंध पर लाठी टेके खड़े 80 वर्षीय बुजुर्ग गंगा मंडल बताते हैं कि 1980 के दशक से भागलपुर शहरी छोर से नवगछिया की तरफ कटाव शुरू हुआ था। पहले फरीदपुर और ननकार से भागे, फिर राघोपुर में शरण मिली। ज्यों-ज्यों नदी ने जमीन काटी, हम नाथनगर से खरीक प्रखंड की सीमा में खिसकते चले गए। जहां कभी हमारा 30 बीघा लहलहाता खेत था, आज वहां सिर्फ दरिया बह रहा है। गंगा मंडल कहते हैं, “हम अपनी ही जमीन पर फकीर बन चुके हैं।”

  • राघोपुर जमींदारी बांध का आधा किलोमीटर हिस्सा गंगा में विलीन, 200 से अधिक घरों को तटबंध खाली करने का मिला प्रशासनिक अल्टीमेटम

  • चार दशक में शंकरपुर, चौवनियां, फरीदपुर, ननकार सहित दर्जनों बस्तियां गंगा में समाईं; नाथनगर के वोटर अब खरीक में बने शरणार्थी

  • 30 बीघा खेत और पक्के घर गंवा चुके बुजुर्ग बोले— ‘सबकुछ गंगा मैया में समा गया, अपनी ही माटी पर फकीर बनकर रह गए’

  • रिंग बांध, ईंट भट्ठों और 14 नंबर सड़क पर तिरपाल के नीचे जिंदगी; स्थायी पुनर्वास और कटावरोधी समाधान की मांग

ग्रामीणों का कहना है कि कटाव फिलहाल धीमा जरूर हुआ है, लेकिन खतरा टला नहीं है। कार्तिक माह में जब पानी घटेगा, तब किनारे की मिट्टी तेजी से धंसेगी और कटाव और विकराल रूप लेगा। यह उस अभागे भूगोल की दास्तान है, जहां हर साल नक्शा बदल जाता है। प्रभावित परिवारों को सिर्फ तात्कालिक सूखा राशन नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास, पक्का आशियाना, उचित मुआवजा और स्थायी कटावरोधी तटबंध चाहिए ताकि उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।

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