एक फॉल्ट, दर्जनों गांव अंधेरे में; हल्की बारिश में ही लखीसराय की बिजली व्यवस्था बेपटरी

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आसमान में बादल छाए, हवा चली और बूंदें गिरीं… इसके साथ ही जिले के कई इलाकों में बिजली चली गई। कहीं दो घंटे तो कहीं पांच-छह घंटे और कई बार आठ से दस घंटे तक आपूर्ति बहाल नहीं हो पाती। उपभोक्ता बिजली कंपनी के शिकायत नंबर पर फोन करते रहते हैं और विभागीय कर्मी फॉल्ट तलाशते रहते हैं।

यह स्थिति एक-दो दिनों की नहीं है। बरसात शुरू होते ही हर वर्ष जिले के कई हिस्सों में यही तस्वीर सामने आती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर मामूली बारिश में ही लखीसराय की बिजली व्यवस्था क्यों दम तोड़ देती है? पड़ताल में समस्या की एक बड़ी वजह जिले की संचरण व्यवस्था में दिखाई देती है।बिहार स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड की आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिले में फिलहाल एक 132/33 केवी ग्रिड सब-स्टेशन विद्यापीठ के पास सलौनाचक में है। इसकी कुल क्षमता 120 एमवीए है।

इस ग्रिड से 33 केवी नेटवर्क के जरिए अलग-अलग विद्युत शक्ति उपकेंद्रों तक बिजली पहुंचती है। यानी जिले के बड़े हिस्से की आपूर्ति एक मजबूत लेकिन सीमित संचरण ढांचे पर टिकी हुई है।

एक लाइन में खराबी और बढ़ जाता है दायरा

33 केवी की लंबी संचरण लाइनें ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों तक बिजली पहुंचाती हैं। बारिश और तेज हवा में पेड़ की डालियों के संपर्क, तारों में खराबी या अन्य तकनीकी फॉल्ट होने पर संबंधित लाइन बंद करनी पड़ती है। इसके बाद फॉल्ट वाले स्थान की पहचान और मरम्मत में समय लगता है।

इस दौरान उससे जुड़े कई उपकेंद्रों और दर्जनों गांवों की आपूर्ति प्रभावित हो जाती है। यही वजह है कि बिजली की उपलब्धता के बावजूद उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली नहीं मिल पा रही है। समस्या आपूर्ति की कम और ट्रांसमिशन-वितरण नेटवर्क की मजबूती की अधिक दिखाई देती है।

हलसी व बड़हिया को मिलेगा मजबूत आधार, सूर्यगढ़ा अब भी इंतजार में

राज्य सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए हलसी एवं बड़हिया में नया 132/33 केवी ग्रिड सब-स्टेशन स्वीकृत किया है। इसकी क्षमता 2×80 एमवीए यानी 160 एमवीए होगी। परियोजना की स्वीकृत लागत अलग-अलग करीब 182.69 करोड़ रुपये है।

नए ग्रिड से संचरण व्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ कई क्षेत्रों को वैकल्पिक आपूर्ति का आधार मिलने की उम्मीद है। हलसी में तो काम भी शुरू है। लेकिन जिले का सबसे बड़ा सवाल सूर्यगढ़ा को लेकर है। 24 पंचायतों और एक नगर परिषद वाले इस बड़े क्षेत्र में अलग ग्रिड निर्माण की मांग वर्षों से उठती रही है।

इसके बावजूद अब तक इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। क्षेत्र के कई हिस्सों को सलौनाचक ग्रिड से बिजली मिलती है। दूरी अधिक होने के कारण 33 केवी लाइन में फॉल्ट होने पर व्यापक क्षेत्र की आपूर्ति प्रभावित होती है। यही स्थिति चानन और रामगढ़ चौक में भी है।

बरसात पूर्व तैयारी पर भी उठ रहा सवाल

विद्युत विभाग की ओर से प्रत्येक वर्ष मानसून से पहले लाइनों की पेट्रोलिंग, पेड़ों की छंटाई, जर्जर तारों और उपकरणों की जांच तथा आवश्यक मरम्मत की जाती है। संचरण क्षमता बढ़ाने के लिए नए 33 केवी लाइन-वे बनाने की योजना भी है।

सरकार ने 62 नए 33 केवी लाइ-वे के निर्माण के लिए 33 करोड़ रुपये की स्वीकृति भी दी है। इसके बाद भी यदि हल्की बारिश में आठ-दस घंटे बिजली गुल हो रही है, तो सवाल सिर्फ फॉल्ट का नहीं बल्कि तैयारी और वैकल्पिक व्यवस्था का भी है।

फॉल्ट होना तकनीकी समस्या हो सकती है, लेकिन उसे ठीक करने में घंटों लगना व्यवस्था की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।

जनप्रतिनिधियों के लिए भी बड़ा सवाल

सूर्यगढ़ा जैसे बड़े क्षेत्र में वर्षों से अलग ग्रिड की मांग के बावजूद अब तक स्थायी समाधान नहीं होना जनप्रतिनिधियों की सक्रियता पर भी सवाल खड़ा करता है। जब हलसी और बड़हिया में नया ग्रिड स्वीकृत हो सकता है तो सूर्यगढ़ा के लिए ऐसी पहल क्यों नहीं। क्षेत्र के लोगों में इस उपेक्षा को लेकर सवाल है।

बिजली विभाग के सामने अब चुनौती सिर्फ बिजली पहुंचाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था खड़ी करने की है जिसमें बारिश की कुछ बूंदें पूरे क्षेत्र को घंटों अंधेरे में न धकेल सकें। हर बरसात में फॉल्ट और घंटों बिजली कटौती की कहानी दोहराने के बजाय स्थायी समाधान की जरूरत है।

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