‘भारत भले ही चांद तक पहुंच गया है, जाति-व्यवस्था की सामाजिक बुराई अब भी मौजूद’, बांबे हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
देश ने अंतरिक्ष विज्ञान में चांद तक की ऐतिहासिक छलांग लगा ली है, लेकिन समाज की गहराई में बैठी जाति-व्यवस्था का काला साया आज भी इंसानी गरिमा को तार-तार कर रहा है।
बांबे हाईकोर्ट ने मैला ढोने (मैनुअल स्कैवेंजिंग) की कुप्रथा पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि 21वीं सदी में वैज्ञानिक उपलब्धियों के बावजूद हमारे देश में यह अमानवीय कृत्य बदस्तूर जारी है, जो कुछ नागरिकों को गरिमाविहीन कार्य करने के लिए मजबूर करता है।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के उस सरकारी प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसके तहत सीवर और स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के स्वजनों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी नियोजकों और सोसायटियों पर डाली गई थी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार और स्थानीय निकायों की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे पीड़ितों के आश्रितों को तुरंत 30 लाख रुपये का मुआवजा दें। इसके बाद सरकार दोषी निजी संस्थाओं या नियोजकों से यह राशि वसूल सकती है।
कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं कि सरकार छह महीने के भीतर “मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम 2013” के दायरे में आने वाले ऐसे सभी व्यक्तियों की पहचान करे, जिनकी मौत स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद खतरनाक सफाई के दौरान हुई है।
कोर्ट ने कहा कि संविधान देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी हम उस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं जिसने पीढ़ियों से एक खास वर्ग को इस अमानवीय काम में धकेल रखा है।
यह फैसला “श्रमिक जनता संघ” द्वारा दायर उस याचिका पर आया, जिसमें 2019 और 2025 के सरकारी प्रस्तावों को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने इन प्रस्तावों को संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन करार दिया। हाईकोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर व्यवस्था की उस लाचारी को बेनकाब कर दिया है, जहां तरक्की की चमक के पीछे आज भी इंसानी जिंदगियां दम तोड़ रही हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

