‘युवा IPS अफसरों को प्रदर्शनकारियों को पीटते देखना दुखद’, जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज से नाराज जस्टिस भुइयां

6.5kViews
1303 Shares

 जंतर-मंतर पर नीट छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने गहरी चिंता और निराशा जताई है। शुक्रवार को उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता और तटस्थता की उम्मीद की जाती है, वह अब कहीं खोती जा रही है। पुलिस को खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला करते देखना बेहद परेशान करने वाला है।

रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद की किताब पुलिसिंग द रिपब्लिक के विमोचन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि यह देखकर हम सभी को गहरी निराशा होती है कि आईपीएस के युवा अधिकारी खुद आगे आकर प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारियों की पिटाई कर रहे हैं। यह स्थिति वाकई बहुत दुखद है।उन्होंने आगे कहा कि पुलिस अधिकारियों से जिस तटस्थता की अपेक्षा की जाती है, वह कहीं न कहीं लुप्त होती जा रही है, और यह वास्तव में गंभीर चिंता का विषय है।

सुप्रीम कोर्ट ने किया जांच पैनल का गठन

जस्टिस भुइयां ने कहा कि अत्यधिक बल प्रयोग या मानवाधिकारों के उल्लंघन के बिना भी प्रभावी पुलिसिंग की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर आम लोगों के लिए, सड़क पर सीटी और लाठी लिए एक पुलिसकर्मी राज्य की शक्ति और अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है।

जब लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, तो वे पुलिस की मदद मांगते हैं। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पुलिस बल अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे।

CJP प्रदर्शन के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई की विभिन्न हलकों में कड़ी आलोचना हुई है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों और संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय पैनल का गठन किया है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाला यह पैनल लाठीचार्ज, आंसू गैस, पेलेट गन के उपयोग, इलेक्ट्रॉनिक बैटन और महिला प्रदर्शनकारियों के लक्षित उत्पीड़न या छेड़छाड़ की शिकायतों की जांच करेगा। इसके साथ ही पैनल झड़पों के सीसीटीवी और वीडियो फुटेज की भी समीक्षा करेगा।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज ने आगे कहा कि अगर सरकारी अधिकारी ही कानून तोड़ने वाले बन जाएं, तो इससे कानून के प्रति अनादर पैदा होगा और अराजकता को बढ़ावा मिलेगा। अगर सरकार के अधिकारी ही कानून तोड़ने वाले बन जाएं, तो इससे कानून के प्रति अनादर पैदा होगा और अराजकता को बढ़ावा मिलेगा।

कोई भी सभ्य देश ऐसा होने नहीं दे सकता। क्या कोई नागरिक उस पल अपना मौलिक अधिकार खो देता है जब कोई पुलिसवाला उसे गिरफ्तार करता है?

सभ्य समाज में सबसे बड़ा अपराध

जस्टिस भुइयां ने देश में हिरासत में होने वाली यातना और मौतों के बढ़ते मामलों का भी जिक्र किया और कहा कि यह एक सभ्य समाज में सबसे भयंकर अपराधों में से एक है।

उन्होंने कहा कि हिरासत में मौत शायद कानून के शासन द्वारा संचालित एक सभ्य समाज में सबसे बड़े अपराधों में से एक है। किसी भी प्रकार की यातना, क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार अनुच्छेद 29 के निषेध के अंतर्गत आएगा, चाहे वह जांच या पूछताछ के दौरान हो या अन्यथा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब सरकार के पदाधिकारी ही कानून तोड़ने वाले बन जाते हैं, तो इससे अराजकता को बढ़ावा मिलता है। अगर सरकार के पदाधिकारी कानून तोड़ने वाले बन जाते हैं, तो यह कानून के प्रति अवमानना पैदा करेगा और अराजकता को बढ़ावा देगा।

कोई भी सभ्य राष्ट्र ऐसा होने की अनुमति नहीं दे सकता। क्या एक नागरिक को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करते ही उसके मौलिक अधिकार छिन जाते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *