MP में सरकारी स्कूलों पर बड़ा संकट: 2,426 बंद, 7 हजार और होंगे मर्ज! सांदीपनि मॉडल से बदलेगा शिक्षा का ढांचा
मध्य प्रदेश में आधुनिक सुविधाओं से लैस सांदीपनि विद्यालयों के विस्तार के साथ सरकारी स्कूलों का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। एक ओर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए बड़े और सर्वसुविधायुक्त स्कूल तैयार कर रही है, वहीं दूसरी ओर कम छात्र संख्या वाले छोटे सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।
करोड़ों के निवेश से बदलेगा ढांचा
सरकार ने सांदीपनि विद्यालय योजना को दो चरणों में विस्तार देने की तैयारी की है। पहले चरण में 370 स्कूल शामिल हैं। इनमें 274 स्कूल स्कूल शिक्षा विभाग और 94 जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत हैं। इन विद्यालयों के विकास पर 13,525 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। यहां करीब 4.43 लाख विद्यार्थियों को प्रवेश देने का लक्ष्य रखा गया है।
दूसरे चरण में 405 सांदीपनि विद्यालय प्रस्तावित हैं। इनके निर्माण और विकास पर 11,390 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। इन स्कूलों में करीब 4.05 लाख अतिरिक्त विद्यार्थियों को प्रवेश देने की योजना है।
दोनों चरणों को मिलाकर प्रदेश में कुल 773 सांदीपनि विद्यालय तैयार करने की योजना है। इन पर लगभग 24,915 करोड़ रुपये खर्च होंगे और इनमें करीब 8.48 लाख विद्यार्थियों के लिए क्षमता विकसित की जाएगी।
15 हजार सरकारी स्कूलों में 20 से भी कम बच्चे
सांदीपनि विद्यालयों के विस्तार के बीच सबसे बड़ा सवाल छोटे सरकारी स्कूलों को लेकर है। प्रदेश में 15,170 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 20 से कम है। इन स्कूलों में फिलहाल अतिथि शिक्षकों के माध्यम से पढ़ाई कराई जा रही है।
सांदीपनि विद्यालयों के पूरी तरह संचालित होने के बाद आसपास के कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को मर्ज करने की संभावना है। योजना के तहत करीब एक से पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले छोटे स्कूलों के विद्यार्थियों को सांदीपनि विद्यालयों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
स्कूल बढ़ें या शिक्षा की गुणवत्ता? फिर खड़ा हुआ पुराना सवाल
स्कूल शिक्षा विभाग के पूर्व संयुक्त संचालक राव कुलदीप सिंह के अनुसार शिक्षा व्यवस्था में संख्या और गुणवत्ता के बीच संतुलन का सवाल लंबे समय से बना हुआ है। अधिक स्कूल होने से विद्यार्थियों की पहुंच आसान होती है, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण हर स्कूल में समान स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण रहता है।
उनका कहना है कि ऐसे फैसलों में व्यवस्था पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण होने के साथ स्थानीय समुदाय की सहभागिता भी जरूरी है। स्कूलों के विलय या विस्तार का निर्णय विद्यार्थियों की सुविधा और उनकी शिक्षा की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
सत्र —सरकारी स्कूल
2019-20– 99,411
2020-21– 99,152
2021-22 — 92,695
2022-23 — 92,441
2023-24 –92,439
2024-25– 92,250
2025-26 — 89,824
आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 में प्रदेश में 99,411 सरकारी स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 89,824 रह गए। यानी इस अवधि में करीब 9,587 स्कूल कम हुए।
बजट बढ़ा, फिर भी सरकारी स्कूलों में बच्चे जुटाना चुनौती
सरकार ने स्कूल शिक्षा पर खर्च भी बढ़ाया है। पिछले दो वर्षों में स्कूल शिक्षा का बजट करीब 9,000 करोड़ रुपये बढ़कर 36,730 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अब सांदीपनि विद्यालयों के जरिए सरकार का जोर कम संख्या वाले स्कूलों की जगह बेहतर सुविधाओं और संसाधनों से लैस बड़े स्कूलों में विद्यार्थियों को पढ़ाने पर है। हालांकि, इस बदलाव के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि छोटे और दूरदराज के क्षेत्रों के बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंच आसान बनी रहे और विलय के नाम पर शिक्षा की दूरी न बढ़े।
मध्य प्रदेश में गुणवत्तायुक्त शिक्षा के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। इसमें सांदीपनि विद्यालय की स्थापना सबसे बड़ा कदम है। सर्वसुविधायुक्त इस विद्यालय के मॉडल को सराहना मिल रही है। इस विद्यालय में आसपास के स्कूलों के विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जा रहा है। बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए बस की सुविधा भी दी जा रही है। जिन स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम रही है, उन्हें पास के स्कूलों में मर्ज किया गया है। इसका लाभ यह हुआ कि जिन स्कूलों में विद्यार्थी कम होने के बाद भी शिक्षक अधिक थे, उन्हें दूसरे स्कूलों में भेजा गया।
– अभिषेक सिंह, आयुक्त, लोक शिक्षण, मध्य प्रदेश

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

