कभी ‘नित्य सुमंगली’ का दर्जा, फिर देहव्यापार का दर्द…हैरान करने वाली है भारत में ‘देवदासी’ परंपरा की कहानी

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क्या आपने देवदासी प्रथा के बारे में सुना है? भारतीय इतिहास में देवदासी प्रथा का इतिहास काफी उलझा हुआ रहा है। धर्म, कला और शोषण से जुड़ी ये प्रथा आज भी कुछ राज्यों में देखने को मिलती है। देवदासी का मतलब होता है ईश्वर की सेविका। आइए जानें इस प्रथा की शुरुआत कैसे हुई और कैसे धीरे-धीरे इसका पतन हुआ।

क्या होती थी देवदासी प्रथा?

देवदासी प्रथा में कम उम्र की लड़कियों की शादी किसी मंदिर के देवता के साथ कर दिया जाता था। इस परंपरा को पोट्टूकट्टू कहा जाता था। भगवान से शादी के बाद वह लड़की जीवनभर शादी नहीं कर सकती थी और उसकी पूरी जिंदगी मंदिर की सेवा, पूजा, साफ-सफाई और मंदिरों में नृत्य करने और गाने के लिए समर्पित होता था।

इसके लिए उन्हें बहुत कम उम्र से ही नाचने और गाने की ट्रेनिंग दी जाती थी और मंदिर की परंपराओं और सेवा के बारे में सिखाया जाता था।

इस प्रथा की शुरुआत कैसे हुई?

देवदासी प्रथा की शुरुआत छठी शताब्दी में मानी जाती है, खासकर दक्षिण भारत के पल्लव और चालुक्य वंश के काल में। शुरुआत में इसका मकसद सिर्फ धर्म और संस्कृति से जुड़ा था। उस दौर में मंदिरों को कला और संस्कृति का केंद्र माना जाता था, जहां शास्त्रीय संगीत और नृत्य को आगे बढ़ाने के लिए देवदासियों को बचपन से ये कलाएं सिखाई जाती थीं

उस समय देवदासी बनना बड़े सम्मान की बात हुआ करती थी और इससे धार्मिक आस्था भी जुड़ी थी। इसलिए लोग अपनी बेटियों को खुशी-खुशी देवदासी बना देते थे।

समाज में इनकी क्या जगह थी?

शुरुआती दौर में देवदासियों को समाज में बेहद सम्मान के साथ देखा जाता था। वे शिक्षित, संगीत-नृत्य में निपुण और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती थीं। उनकी शादी भगवान से हुई होती थी, इसलिए उन्हें नित्य सुमंगली यानी कभी विधवा न होने वाली कहा जाता था। इसी वजह से शुभ अवसरों पर उनकी उपस्थिति को काफी शुभ माना जाता था।

हालांकि, मध्यकाल में उनके ओहदे में गिरावट आई। मुगलों और अंग्रेजों के आने के बाद देवदासियों की समाज में इज्जत कम होने लग गई। सामंती व्यवस्था के बाद मंदिर के शक्तिशाली पुजारी और जमींदार इनका शारीरिक और मानसिक शोषण करने लगे। यह प्रथा धीरे-धीरे देहव्यापार का जरिया बन गई, जहां गरीब और निचली जातियों की लड़कियों को धकेला जाने लगा।

यह प्रथा खत्म कैसे हुई?

इस प्रथा के खिलाफ 20वीं शताब्दी में समाज सुधारकों ने आवाज उठाई। देश की पहली महिला विधायक रहीं डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने देवदासी प्रथा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और इसके खिलाफ कानून बनाने के लिए जोर दिया।

आज देवदासी प्रथा के खिलाफ कई कानून हैं, जो लड़कियों के शोषण और देहव्यापार को रोकने के लिए बनाए गए हैं। बावजूद इसके कई राज्यों में आज भी देवदासी प्रथा चल रही है, क्योंकि आज भी कई परिवार इसे धार्मिक दृष्टि से सही मानते हैं।

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