123 साल के अध्ययन में बड़ा खुलासा, तीन महासागरों से बदलता है भारतीय मानसून का मिजाज
भारतीय मानसून पर केवल हिंद महासागर का असर नहीं पड़ता। 123 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में सामने आया है कि मानसून का मिजाज प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागरों के बदलते प्रभावों से जुड़ा है।
हाल के वर्षों में प्रशांत महासागर और अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) का प्रभाव फिर मजबूत हुआ है, जबकि हिंद और अटलांटिक की भूमिका क्षेत्रवार बदली है।
यह अध्ययन जापान एजेंसी फार मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलाजी से जुड़े कल्पेश आर पाटिल, स्वाधीन बेहरा और तोशियो यामागाता ने किया। यह 13 अगस्त 2026 को क्लाइमेट एंड एटमास्फेरिक साइंस में प्रकाशित हुआ।
विज्ञानियों ने 1901 से 2023 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। जिसमें समुद्र की सतह के तापमान और जून-सितंबर मानसून वर्षा के संबंध के लिए 11-11 वर्ष की चलती विंडो इस्तेमाल की गईं। इससे 112 समुद्र-सतह तापमान-मानसून सहसंबंध मानचित्र तैयार हुए।
हिंद महासागर की भूमिका बदली
इंडियन ओशन डाइपोल, दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर और मेडागास्कर क्षेत्र का प्रभाव अलग अवधियों में सामने आया है। 20 डिग्री सेल्सियस समताप रेखा की गहराई को ऊपरी समुद्र की तापीय स्मृति का संकेतक माना गया। दक्षिण-पूर्वी अरब सागर का संबंध दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में अधिक वर्षा से मिला।
अटलांटिक से भी जुड़ाव
1985-1996 में उत्तरी अटलांटिक का मानसून से सकारात्मक संबंध मजबूत रहा। इसी अवधि में 1987 और 1994 जैसे मानसूनी उतार-चढ़ाव आए, जबकि अल नीनो और हिंद महासागर के संकेत कमजोर थे। भूमध्यरेखीय अटलांटिक का संबंध मध्य और उत्तरी भारत में अधिक वर्षा से मिला। उत्तरी अटलांटिक का दक्षिणी प्रायद्वीप में नकारात्मक और पूर्वी भारत में सकारात्मक संबंध दिखा।
हर दौर में बदला प्रभाव
वर्ष 1932-1941, 1982-1994 और 1998-2004 में मानसून की असामान्य स्थितियों को अल नीनो और हिंद महासागर पूरी तरह नहीं समझा सके। इन दौरों में दक्षिणी हिंद महासागर, अटलांटिक और मैरिटाइम कान्टिनेंट के संकेत उभरे। निष्कर्ष है कि बेहतर मानसून पूर्वानुमान के लिए तीनों महासागरों के बदलते प्रभावों को साथ समझना जरूरी होगा।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

