सुमित थपलियाल, देहरादून। इस रक्षाबंधन भाई की कलाई पर सिर्फ राखी नहीं, स्वदेशी हुनर और आत्मनिर्भरता का संदेश भी सजेगा। चीन निर्मित राखियों के विकल्प के तौर पर स्वयं सहायता समूहों और महिला समूहों की ओर से इस बार बीज, मोती, ऊन, पिरूल और ऐपण से आकर्षक राखियां तैयार की जा रही हैं। खास बात यह है कि इन राखियों में सजाए गए बीज बाद में मिट्टी में बोकर पौधे भी उगाए जा सकते हैं। यानी राखी का त्योहार खत्म होने के बाद भी इसका संदेश जमीन पर दिखाई देगा।
विकासनगर के ग्राम फतेहपुर में जय माता दी ग्राम संगठन से जुड़े 10 से अधिक महिला समूह थाली और ऐपण राखी के साथ रंगीन चावल, वेलवेट कपड़े, गत्ते, रुद्राक्ष, मोती और ऊन से राखियां तैयार कर रहे हैं। महिला जागृति समूह की महिलाएं गांव में ही इन्हें बना रही हैं। 25 से 30 रुपये कीमत वाली इन राखियों की इस सप्ताह करीब 15 हजार रुपये की बिक्री हो चुकी है। महिलाओं के लिए यह महज मौसमी कारोबार नहीं, बल्कि अपने हुनर को बाजार तक पहुंचाने और आत्मनिर्भर बनने की नई राह भी है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

