गिरीश्वर मिश्र। स्वतंत्रता सभ्य मानव समाज का सर्वोत्तम आविष्कार है, जो मनुष्य को अपने चुने हुए लक्ष्यों को पाने के लिए सामर्थ्य संपन्न बनाती है। आज विकास, प्रगति और उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए स्वतंत्रता को सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है। स्वतंत्रता समर्थ बनाती है, यही सोच कर पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए विश्व में अनेक संग्राम होते आ रहे हैं।
वस्तुतः प्राणिमात्र उस नैसर्गिक परिस्थिति में ही जीना चाहता है, जिसमें मुक्त होकर अपनी शर्तों पर जिया जा सके। पराधीनता के बीच रहते हुए हमें स्वयं अपने मार्ग को चुनने की छूट नहीं होती है, इसलिए वह अवांछनीय है। यह जरूर है कि स्वतंत्रता सिर्फ भोग नहीं है, क्योंकि भोग के रूप में वह दूसरों के शोषण का जरिया हो जाएगी। स्वतंत्रता देश से जुड़ने की वृत्ति है।
भारत को उपनिवेश बनाने के बाद अंग्रेज़ों ने भारतीय समाज के जीने और सोचने के विकल्पों को सिलसिलेवार समाप्त करने की कोशिश की। उन्होंने अपने निहित स्वार्थ के दृढ़ संकल्प के साथ न केवल भारत का आर्थिक दोहन किया, बल्कि हमारे लिए विकल्प भी तय किए और अपनी सोच हमारे ऊपर लादते गए।
उन्होंने हजारों वर्षों की ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र की अमूल्य विरासत को झुठलाते हुए भारत को एक असभ्य देश घोषित कर दिया और बिन मांगे यहां के समाज को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी अपने सिर उठा ली।
अंग्रेज़ एक पूरे पैकेज के साथ एक पूरी सभ्यता को खत्म करने के अभियान पर थे, जो कई अर्थों में उनसे समृद्धतर थी। यह समृद्धि विदेशियों के लिए पहले भी आकर्षण का कारण बन चुकी थी।
अंग्रेज़ों ने अपना उपक्रम शिक्षा और संस्कृति में बदलाव के सुनियोजित कार्यक्रम के द्वारा बहुत प्रभावी ढंग से लागू किया और उन्हें सफलता भी मिली। अंग्रेज़ों ने शिक्षा का जो स्वरूप, विषय वस्तु और पद्धति निर्धारित की, वह उनकी अपनी थी और यह स्वाभाविक ही था कि उसमें भारतीय ज्ञान परंपरा को जगह न मिले।
अंग्रेज़ों ने औपनिवेशिक साम्राज्य को पुष्ट करने के लिए भारतीय ज्ञान के विपुल भंडार के प्रति विद्वेष और संशय का भाव इस तरह प्रचारित और प्रसारित किया कि उसे लेकर आम भारतीय के मन में संशय का भाव घर कर गया। कालांतर में भारतीय चिंतन पर से लोगों का भरोसा उठता चला गया और वह त्याज्य होती गई। उसका परिणाम सामने है- भारत अपने मौलिक अर्थ में आज के अनेक भारतीयों के लिए अपरिचित सा होता जा रहा है।
बहुत से पढ़े-लिखे लोगों को किसी एकल भारतीय दृष्टि के बारे में संदेह हो चला है। भारत, भारतीयता और भारत–भाव अब विवाद का प्रश्न बन गए हैं। भाषा, वेश-भूषा और भाव सभी की दृष्टि से आधुनिक भारतीय अपने को अंग्रेज़ों के तुल्य रखना चाहता है। ऐसे में भारतीय भाषाएं और यहां की अपनी ज्ञान-परंपरा भारत की आधुनिक शिक्षा की औपचारिक प्रणाली के लिए आज भी अनुपयुक्त ही जा रही है। उसे अपनाने में भय लगता है। वह इस तरह बाहर धकेल दी गई कि उसके प्रति भारतीय जन-समाज का भरोसा अभी तक जम नहीं पाया।
वह उसे प्रासंगिक नहीं मानती। वह उसके लिए पूजनीय है या हो सकती है, पर उसका सही स्थान संग्रहालय तो हो सकता है, पर दैनिक जीवन कदापि नहीं। वास्तविकता यही है कि औपनिवेशिक सोच की बेड़ियों से मुक्त होकर ही वास्तविक स्वराज मिल सकेगा। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत अंग्रेज़ों के चंगुल से आजाद हुआ।
यह एक पीड़ादायी सुख का क्षण था। भारतवासियों को इस स्वतंत्रता की क़ीमत अखंड भारत के विभाजन और भीषण रक्तपात से चुकानी पड़ी थी। पाकिस्तान बनने में लाखों भारतीयों को विस्थापन की मार झेलनी पड़ी और धन-जन की अकूत हानि हुई। इस ऐतिहासिक घटना को हुए अब अस्सी बरस होने को हैं, पर इसके जख्म अभी भी पूरी तरह से नहीं भरे हैं।
स्वतंत्र भारत की अब तक की यात्रा पूरी तरह निर्विघ्न नहीं रही है, पर अनेक उपलब्धियां गौरवपूर्ण रही हैं। खाद्यान्न की उपलब्धता, सामरिक तैयारी, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, डिजटल लेन-देन व्यवस्था आदि अनेक क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। अति गरीबी की स्थिति कम हुई है, पर जनसंख्या में वृद्धि को देखते हुए संसाधन कम पड़ रहे हैं और संसाधनों के उपयोग करने में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में झूठे- सच्चे मुकदमे आपसी मतभेद, धोखाधड़ी और अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति को भी दर्शाते हैं।
राजनीति के क्षेत्र में नैतिक आचरण की दृष्टि से दुर्बलता बढ़ रही है। नेता अपनी सुविधा सुनिश्चित करने में यह भूल जाते हैं कि नेतृत्व करना गहरे दायित्व बोध की अपेक्षा करता है। यह चिंताजनक है कि आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ी है और कदाचार के मामले भी।
युवा देश होने के कारण, जिसकी अधिकांश जनसंख्या 35 साल की उम्र के नीचे है, यह जरूरी है कि युवा वर्ग को अच्छी शिक्षा और रोज़गार का अवसर मिले। इसके लिए शैक्षिक संस्कृति में सुधार हो और शिक्षा के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराए जाएं। जेन जी और जेन अल्फा के प्रदर्शन और आक्रोश के संदेश को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
आज व्यक्तिवाद और भौतिक सुख जुटाने की दौड़ में सबको अकेले अपने भर की चिंता है। निजी स्वतंत्रताओं का जश्न मनाया जा रहा है। देश के बारे में सोचने का काम यानी जोड़ने जुड़ने का प्रयास पिछड़ रहा है जबकि परस्पर संबद्धता ही जीवन का रहस्य है। आज हम खंड-खंड होते जा रहे हैं, क्योंकि हम केवल अपने स्वार्थ में ही निवेश कर रहे हैं। स्वतंत्रता कभी भी निरपेक्ष नहीं हो सकती। स्वच्छंदता मुक्तिदायी न होकर विनाशकारी ही होगी।
हम यह भूल रहे हैं कि जिस स्वतंत्रता का हम उपभोग कर रहे हैं, उसके लिए हम देश और समाज के ऋणी हैं। इस ऋण की स्वीकृति हो तो जीवन के विभिन्न स्तरों पर आपसी संबद्धता का अनुभव होगा। स्वतंत्रता के विधि-निषेध हम भूलते जा रहे हैं। स्वतंत्रता का फलितार्थ उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के साथ ही मिल पाता है। देशात्म भाव और सर्व की चिंता करते हुए यानी लोक-संग्रह में ही स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता भोग नहीं कर्म-योग के लिए सतत प्रतिदान का आवाहन है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

