कभी युद्ध जीतकर लौटे राजाओं के स्वागत में होता था यह नृत्य, आज है बुंदेलखंड की शान; दिलचस्प है ‘राई’ का इतिहास

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 हर क्षेत्र की अपनी संस्कृति होती है, जो वहां के लोकगीत और नृत्यों में झलकती है। अगर आपको बुंदेलखंड की संस्कृति के बारे में जानना चाहते हैं, तो आपको वहां के राई नृत्य के बारे में जरूर पता होना चाहिए। शादी-ब्याह से लेकर मेलों तक, बुंदेलखंड में राई नृत्य का अपना खास महत्व है। आइए जानें इस लोक नृत्य से जुड़ी कुछ बातें।

राई नृत्य का इतिहास

राई नृत्य सदियों पुराना है, जिसकी जड़ें बुंदेलखंड के राजाओं और रियासतों के दौर से जुड़ी है। पुराने समय में जब राजा युद्ध जीतकर लौटते थे, तो उनके स्वागत के लिए यह नृत्य आयोजित किया जाता था। राई का मतलब सरसों के छोटे दाने होता है। इस नृत्य में नृत्यांगना तेज गति से गोल-गोल घूमकर नृत्य करती है, जैसे बर्तन में राई घूमती है, इसलिए इसका नाम राई रखा गया। धीरे-धीरे यह नृत्य हर खुशी के अवसर पर किया जाने लग गया।

कैसे किया जाता है ये नृत्य?

इस नृत्य में मुख्य नृत्यांगना, जिसे बेढ़नी कहते हैं, बीच में खड़ी होती है और उसके साथ बाकी कलाकार और मृदंगिया खड़े होते हैं। इसकी शुरुआत मृदंग की धीमी ताल पर और घुंघरुओं की झंकार से होती है। नृत्य के बीच में कलाकार स्वांग भी रचाते हैं, जिसमें रोजमर्रा की घटनाओं पर व्यंग्य किया जाता है। ये काफी मनोरंजक होता है।

जैसे-जैसे मृदंग की थाप तेज होती है, वैसे-वैसे इस नृत्य की भी गति तेज हो जाती थी, जो इस नृत्य की खासियत है। मृदंग की ताल पर तेज गति से होते इस नृत्य से नजरे हटाना मुश्किल हो जाता है।

राई नृत्य की खासियत

राई नृत्य की सबसे बड़ी खासियत है तेज चक्कर में घूमती हैं और पूरे डांस के दौरान अपना बैलेंस बनाकर रखती हैं। मृदंगियों और नृत्यांगना के बीच की जुगलबंदी भी देखने लायक होती है। मृदंग की हर थाप के साथ पैरों की थिरकन देखने में बेमिसाल लगती है। इस डांस में लोकनाट्य का भी संगम होता है। छोटे-छोटे व्यंग्यों से भरे स्वांग इस डांस को और मनोरंजक बना देते हैं।

राई नृत्य की पोशाक कैसी होती है?

इस नृत्य के लिए नृत्यांगना लहंगा-चोली और ओढ़नी पहनती है। यह पोशाक काफी रंग-बिरंगी, गोटे-पट्टी और सितारों से सजी होती है। जब नृत्यांगना घोल घेरे में घूमती है, तब लहंगा इस डांस को और खूबसूरत बना देता है।

इस नृत्य के लिए पैरों में भारी घुंघरू, कमरबंद, बाजूबंद, नथ, टीका और हंसली जैसे पारंपरिक राजस्थानी और बुंदेली गहने पहने जाते हैं। पुरुष नृतक अक्सर धोती-कुर्ता और सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ी पहनते हैं।

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