कश्मीर केवल अपनी बर्फीली चोटियों, झीलों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि इसकी पहचान यहां के सुगंधित सेब, केसर, अखरोट, बादाम, मसालों और शुद्ध वन उत्पादों से भी जुड़ी है। सदियों से कश्मीर की धरती ने ऐसी कृषि उपज दी है, जिसकी गुणवत्ता और स्वाद ने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है।लेकिन बदलते समय के साथ खेती की चुनौतियां भी बदली हैं।
अधिक उत्पादन की दौड़ में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता ने अब मिट्टी की सेहत, जल स्रोतों, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आज जम्मू-कश्मीर की कृषि व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। सवाल केवल इतना नहीं है कि खेतों में कितना उत्पादन हो रहा है, बल्कि यह भी है कि यह उत्पादन कितना सुरक्षित, टिकाऊ और आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना लाभकारी है।
रासायनिक खेती की कीमत: उत्पादन बढ़ा, चुनौतियां भी बढ़ीं
हरित क्रांति के दौर में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसानों को कम समय में अधिक पैदावार मिलने लगी, लेकिन लंबे समय तक इनके अत्यधिक उपयोग ने कई नई समस्याओं को जन्म दिया।
शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय जम्मू में कृषि वैज्ञानिक डा संदीप साहनी के अनुसार, लगातार रासायनिक उपयोग से मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक पोषक तत्वों का संतुलन प्रभावित होता है। मिट्टी की उर्वरता कम होने के साथ-साथ सूक्ष्म जीवों की संख्या घटती है और खेती की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है।
खेतों में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन केवल फसल तक सीमित नहीं रहते। छिड़काव के बाद इनका एक हिस्सा हवा में घुल जाता है, कुछ मिट्टी में रिसकर भूजल तक पहुंचता है और वर्षा के पानी के साथ नदियों, झीलों तथा अन्य जल स्रोतों में मिल सकता है।इसका प्रभाव केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि किसानों, खेत मजदूरों और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
दुनिया बदल रही , कृषि नीति भी बदलनी होगी
डॉ. संदीप के अनुसार विश्व के कई देशों ने खतरनाक कृषि रसायनों के उपयोग पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लागू किए हैं। पैन यूरोप की ‘सूची की सूची’ रिपोर्ट में 110 से अधिक ऐसे कीटनाशक सक्रिय तत्वों का उल्लेख किया गया है, जिन पर यूरोपीय संघ में प्रतिबंध या गंभीर नियंत्रण लागू हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में कृषि रसायनों के विवेकपूर्ण उपयोग और सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा देना समय की मांग है।कश्मीर की भौगोलिक स्थिति, पहाड़ी पर्यावरण और जल स्रोतों की संवेदनशीलता को देखते हुए यहां टिकाऊ कृषि मॉडल की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
बागानों से उठी स्वास्थ्य संबंधी चिंता
जम्मू-कश्मीर में कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग को लेकर विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों ने स्वास्थ्य संबंधी चिंता जताई है। जम्मू क्षेत्र के सब्जी उत्पादकों और कश्मीर घाटी के सेब उत्पादकों में कृषि रसायनों के संपर्क से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिम सामने आए हैं।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा की पर्यावरण समिति ने अपनी रिपोर्ट में कश्मीर के बागानों में काम करने वाले किसानों में ब्रेन ट्यूमर के अधिक मामले सामने आने और इसे कीटनाशकों के संपर्क से जोड़ने का उल्लेख किया है। शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान के एक अध्ययन में भी सब्जी और फल उत्पादकों में कैंसर तथा कीटनाशकों के उपयोग के बीच संभावित संबंध पर प्रकाश डाला गया है।
बागवानी क्षेत्रों में मस्तिष्क कैंसर से जुड़े एक अध्ययन में 432 मरीजों का विश्लेषण किया गया, जिनमें कई लोग बागानों में काम करते या लंबे समय तक कृषि रसायनों के संपर्क में रहे थे। अन्य शोधों में कैंसर, गुर्दे और तंत्रिका संबंधी समस्याओं को लेकर भी चिंता जताई गई है।
सिर्फ उत्पादन नहीं, सुरक्षित भोजन भी जरूरी
जम्मू कश्मीर के पूर्व बागवानी निदेशक चौधरी माेहम्मद इकबाल ने कहा कि आज कृषि की सफलता का पैमाना केवल पैदावार नहीं हो सकता। आधुनिक कृषि का लक्ष्य ऐसा भोजन उपलब्ध कराना होना चाहिए जो पौष्टिक भी हो और सुरक्षित भी। मिट्टी, पानी और फसलों में रासायनिक अवशेषों की मौजूदगी खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकती है।
भविष्य की कृषि नीति में ‘अधिक उत्पादन’ के साथ ‘स्वस्थ उत्पादन’ को भी प्राथमिकता देनी होगी और मौजूदा दौर में जैविक कृषि उत्पादों का बढ़ता बाजार इसकी पुष्टि करता है। अब आपको एक कनाल में कितने क्विंटल सब्जी या फल उगाने के बजाय उनकी गुणवत्ता और पोष्टिकता पर ध्यान देने की जरुरत है।
समग्र कृषि विकास कार्यक्रम: बदलाव की मजबूत नींव
उपजिला कृषि अधिकारी अरुण जराल ने कहा कि बदलती जरूरत को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 5,013 करोड़ रुपये के समग्र कृषि विकास कार्यक्रम के तहत कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए 29 परियोजनाएं शुरू की हैं।कीटनाशकों का इस्तेमाल घटाने के लिए 27 करोड़ रुपये की परियोजना में समेकित कीट प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, जैविक विकल्प और सुरक्षित छिड़काव तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
281.38 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत उच्च घनत्व वाली बागवानी और पुराने बागों के पुनर्जीवन पर जोर है। वहीं 84 करोड़ रुपये की टिकाऊ कृषि योजना में मिश्रित खेती, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक संतुलन आधारित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसान को भरोसा मिला तो बदलेगा खेत
युवा किसान अविनाश चौधरी का कहना है कि रासायनिक खेती से प्राकृतिक और टिकाऊ खेती की ओर बदलाव एक दिन में संभव नहीं है। किसानों को बदलाव की अवधि में आर्थिक सहायता, प्राकृतिक कृषि सामग्री, सुरक्षित उपकरण और रसायन-मुक्त उत्पादों के लिए बेहतर कीमत उपलब्ध करानी होगी।
साथ ही खतरनाक कृषि रसायनों को चरणबद्ध तरीके से बाजार से हटाने, छोटे किसानों के लिए आसान प्रमाणन व्यवस्था बनाने और कृषि विश्वविद्यालयों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्राकृतिक खेती के मॉडल विकसित करने की जरूरत है।
कश्मीर की कृषि को मिल सकता है वैश्विक बाजार
बागवानी विभाग में योजनाएं एवं विपणन निदेशक एयाज नतनु के अनुसार, कश्मीर का सेब, केसर, अखरोट और अन्य उत्पाद पहले से ही गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। यदि इन्हें प्रमाणित रसायन-मुक्त और प्राकृतिक उत्पादन से जोड़ा जाए तो जम्मू-कश्मीर के कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिल सकती है।
कश्मीर की कृषि का भविष्य अब केवल ‘ज्यादा उत्पादन’ में नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित, स्वच्छ और टिकाऊ उत्पादन’ में है। किसान, वैज्ञानिक, नीति निर्माता और बाजार व्यवस्था मिलकर आगे बढ़ें तो यह बदलाव न केवल पर्यावरण बचा सकता है, बल्कि किसानों की आय और कश्मीर की कृषि पहचान को भी नई ऊंचाई दे सकता है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

