सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगर निगम को मिली 272 एकड़ राजस्व रिकाॅर्ड में गैर मुमकिन पहाड़, नाले और जोहड़ की जमीन दर्ज है। करीब 25 हजार करोड़ रुपये मूल्य की इस जमीन को लेकर लगभग दस निजी कंपनियों के साथ लंबे समय से विवाद चल रहा था। कई वर्षों तक मामला न्यायालय में लंबित रहने और स्टे के कारण इस भूमि पर किसी प्रकार का निर्माण या विकास कार्य नहीं हो सका।
जमीन अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज
अब विवाद समाप्त होने के बाद सरकार और नगर निगम स्तर पर इस जमीन के भविष्य के उपयोग की योजना बनाई जाएगी। नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार इस 272 एकड़ भूमि का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा खाली है। राजस्व रिकाॅर्ड में इस जमीन को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया गया है।
इनमें गैर मुमकिन पहाड़, गैर मुमकिन नाला, गैर मुमकिन जोहड़, गैर मुमकिन चारागाह और गैर मुमकिन रास्ता शामिल हैं। जमाबंदी रिकाॅर्ड के अनुसार 258 बीघा 9 बिस्वा भूमि गैर मुमकिन पहाड़, 165 बीघा 17 बिस्वा भूमि गैर मुमकिन नाला तथा 2 बीघा 2 बिस्वा भूमि गैर मुमकिन जोहड़ के रूप में दर्ज है। इस तरह की जमीन के उपयोग के लिए कड़े नियम बने हुए हैं।
क्या होता है गैर मुमकिन पहाड़?
राजस्व रिकाॅर्ड में गैर मुमकिन पहाड़ ऐसी भूमि को कहा जाता है, जो प्राकृतिक रूप से पहाड़ी, चट्टानी अथवा पथरीली होती है और जिस पर सामान्य कृषि या नियमित निर्माण संभव नहीं माना जाता। इसी प्रकार गैर मुमकिन नाला प्राकृतिक जल निकासी मार्ग तथा गैर मुमकिन जोहड़ जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोत को दर्शाता है। ऐसी जमीन का उपयोग उसके मूल स्वरूप, राजस्व रिकाॅर्ड और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुरूप ही किया जाता है। यदि किसी प्रकार का भूमि उपयोग परिवर्तन किया जाना हो तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनेगी उपयोग की योजना
नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि अब जमीन पर मालिकाना हक स्पष्ट होने के बाद सरकार और निगम स्तर पर राजस्व रिकाॅर्ड का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा। इसके बाद प्रत्येक श्रेणी की भूमि के अनुरूप उसके उपयोग का निर्णय लिया जाएगा। चूंकि भूमि का बड़ा हिस्सा अरावली क्षेत्र में आता है, इसलिए भविष्य की योजना बनाते समय पर्यावरणीय नियमों और राजस्व रिकाॅर्ड दोनों को आधार बनाया जाएगा।
यह है पूरा मामला
गुरुग्राम के निर्जन गांव (बेचिराग, ऐसा गांव जो सिर्फ राजस्व रिकाॅर्ड में दर्ज होता है, आबादी नहीं होती) हैदरपुर की 436 बीघा 18 बिस्वा (करीब 272 एकड़) बहुमूल्य शामलात देह भूमि को लेकर वर्ष 1985 से कानूनी विवाद चल रहा था।
निजी पक्ष इस भूमि को विभिन्न पट्टियों की निजी संपत्ति बता रहा था, जबकि ग्राम पंचायत का कहना था कि राजस्व रिकाॅर्ड में यह भूमि शामलात देह दर्ज है और उस पर पंचायत का अधिकार है। मामला राजस्व न्यायालयों, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ग्राम पंचायत के अधिकार (अब उत्तराधिकारी के रूप में नगर निगम गुरुग्राम) को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि केवल कब्जे या सीमित उपयोग के आधार पर शामलात देह भूमि पर निजी स्वामित्व का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद करीब 272 एकड़ भूमि पर नगर निगम का मालिकाना हक सुनिश्चित हो गया।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

