कागजों पर ‘ग्रीन’ लेकिन असलियत में सबसे गर्म, ऊंची इमारतों और कांच के टावरों की होड़ में भट्टी बन रहा हैदराबाद
कांच की चमकदार गगनचुंबी इमारतें और कई एकड़ में फैली आलीशान सोसाइटियां भले ही आज हैदराबाद की नई पहचान बन चुकी हैं, लेकिन यही तकनीक अब शहर के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती का रूप ले रही है।
कंक्रीट और शीशे का यह बढ़ता जाल शहर में अर्बन हीट आईलैंड प्रभाव को तेजी से बढ़ावा दे रहा है, जिसके कारण पक्के निर्माण वाले इलाके अपने आसपास के खुले क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा गर्म हो रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि शहर में जो इलाके सबसे ज्यादा तप रहे हैं, वहीं पर इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (IGBC) से प्रमाणित इमारतों की संख्या सबसे ज्यादा है।
कागजों में तो इन इमारतों को गर्मी कम करने, ऊर्जा की बचत करने और पर्यावरण के अनुकूल रहने के लिए ग्रीन सर्टिफिकेशन मिला हुआ है, लेकिन धरातल पर स्थिति बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
क्यों नाकाम हो रही हैं ग्रीन इमारतें?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, समस्या ग्रीन इमारतों की तकनीक में नहीं, बल्कि उनकी बेहद कम संख्या में है। हैदराबाद अर्बन लैब और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के अध्ययनों में गैचीबोवली, हाईटेक सिटी, फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट, माधापुर और कुकटपल्ली जैसे इलाकों को सबसे गर्म हॉटस्पॉट पाया गया है।
इन इलाकों में ग्रीन-सर्टिफाइड इमारतों की भरमार होने के बावजूद, वे डामर की सड़कों, पक्के निर्माणों और साधारण इमारतों के मुकाबले बहुत कम हैं।
शहरी नियोजक और आर्किटेक्ट श्रीनिवास मूर्ति बताते हैं कि शहर में 90 प्रतिशत से अधिक इमारतें अब भी पारंपरिक कंक्रीट और साधारण शीशों से बन रही हैं। ऐसी स्थिति में गिनती की कुछ ग्रीन इमारतें पूरे पड़ोस या शहर का तापमान कम नहीं कर सकतीं।
ऊंची दीवारें और कम हरियाली बढ़ा रही तापमान
आजकल की नई इमारतों में इस्तेमाल होने वाला साधारण कांच सूरज की गर्मी को सोखकर आसपास के इलाके में वापस फैलाता है। हालांकि IGBC बिल्डरों को ‘हाई-परफॉर्मेंस ग्रीन ग्लास’ इस्तेमाल करने की सलाह देता है, लेकिन लागत बचाने के चक्कर में इसका इस्तेमाल बेहद सीमित है।
इसके साथ ही, इमारतों के परिसर में खाली जमीन छोड़ने के बजाय उसे पार्किंग और रास्तों के लिए पक्का (कंक्रीट) कर देने से जमीन गर्मी सोखने लगती है।
एक अध्ययन के अनुसार, नानकरामगुड़ा की एक बहुमंजिला सोसाइटी में सौर ऊर्जा और रेनवाटर हार्वेस्टिंग जैसी सुविधाएं होने के बावजूद अत्यधिक पक्के निर्माण की वजह से परिसर के अंदर तापमान 34.7 डिग्री था, जो दीवार से महज 100 मीटर बाहर निकलते ही 38.1 डिग्री के पार पहुंच गया।
इसके ठीक उलट, कोमपल्ली के एक आवासीय प्रोजेक्ट में 70 प्रतिशत हिस्सा खुला और हरा-भरा रखने के कारण वहां अंदर और बाहर के तापमान में भारी अंतर देखा गया और लोगों की एसी पर निर्भरता कम हई।
कड़े नियमों की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि शहर को इस प्रचंड गर्मी से बचाने के लिए केवल एक इमारत को ठंडा रखना काफी नहीं है, बल्कि पूरे पड़ोस के स्तर पर नीतियां बनानी होंगी।
जैसे अमेरिका के लॉस एंजिल्स शहर ने 1950 के दशक में भीषण प्रदूषण और धुंध से निपटने के लिए बेहद कड़े नियम और तकनीक लागू करके सुधार हासिल किया था। ठीक उसी तरह हैदराबाद को भी अपनी नीति में बदलाव करने की जरूरत है।
एक्सपर्ट्स ने सुझाव दिया है कि अब समय आ गया है जब बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स के लिए पर्यावरण प्रभाव की तरह हीट इम्पैक्ट एसेसमेंट को अनिवार्य बनाया जाए।
इसके साथ ही, सड़कों पर डार की जगह हवा और पानी सोखने वाले मटीरियल का इस्तेमाल, इमारतों पर कूल रूफ तकनीक लागू करना और कांच के अत्यधिक इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए बिल्डिंग बायलॉज में सुधार करना बेहद जरूरी हो गया है।
IGBC के अनुसार, इमारतों को ‘ग्रीन’ (गोल्ड या प्लेटिनम) बनाने में कुल लागत का महज 1 से 2 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च आता है, जिसकी भरपाई 3-4 सालों में बिजली के बिल में बचत से हो जाती है।
ऐसे में अगर सरकार बेहतर कूलिंग परिणाम देने वाले बिल्डरों को टैक्स और एफएसआई (FSI) में छूट जैसे प्रोत्साहन दे, तो हैदराबाद को एक गर्म भट्टी बनने से बचाया जा सकता है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

