‘हमेशा के लिए जा सकती है आंखों की रोशनी’, जंतर-मंतर हिंसा के बाद पैलेट गन के खतरों पर क्या बोले एक्सपर्ट्स?
संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों को लगी पैलेट गन से चली गोलियों से लगी चोट पर जारी बहस के बीच एम्स के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर गुप्ता ने पूछे जाने पर कहा कि पैलेट चोट की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि वह शरीर के किस हिस्से में लगी है।
विशेषज्ञों के अनुसार पैलेट गन से एक साथ बड़ी संख्या में छोटे धातु या प्लास्टिक के छर्रे निकलते हैं। इससे आंख, चेहरा, गर्दन, छाती और अन्य संवेदनशील अंगों पर लगी चोट गंभीर परिणाम दे सकती है। कई मामलों में आंख की रोशनी प्रभावित होने या महत्वपूर्ण अंगों को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
चोट की गंभीरता केवल छर्रों की संख्या से नहीं, बल्कि फायरिंग की दूरी, गति और शरीर के जिस हिस्से पर पैलेट लगा है, उससे तय होती है। कम दूरी से चलाए गए पेलेट मांसपेशियों, नसों और रक्त वाहिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पैलेट गन की चोट कितनी खतरनाक हो सकती है?
20 जुलाई को नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के दौरान आरोप है कि कई प्रदर्शनकारी पैलेट गन से चली गोलियों से घायल हुए थे। कई छात्रों के चेहरे, आंख, गर्दन, सीने, हाथ और पैरों में चोटें आईं।
इससे नजफगढ़ निवासी 19 वर्षीय साहिल लोछाब की दाहिनी आंख में गंभीर चोट लगने का दावा किया गया है। चोट की गंभीरता को देखते हुए उसकी आंख की रोशनीे जाने की आशंका जताई जा रही है।
इसके अलावा गुरुग्राम निवासी 25 वर्षीय शेख इरशाद मंसूरी को चेहरे, गर्दन और शरीर में कई छर्रे लगने का आरोप लगाया गया जबकि 25 वर्षीय प्रशांत को दाहिने हाथ में पैलेट जैसी चोट लगने का दावा किया गया है।
विशेषज्ञों ने इलाज और जोखिम को लेकर क्या बताया?
सर्वोदय अस्पताल के आर्थोपेडिक विशेषज्ञ डाॅ. निखिल वालसंगकर ने बताया कि यदि नस, रक्त वाहिकाएं, हड्डी या महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो जाएं तो कई मामलों में नुकसान अपूरणीय हो सकता है। ऐसे मरीजों को लंबे समय तक उपचार और कई बार एक से अधिक सर्जरी की जरूरत पड़ती है।
यथार्थ अस्पताल की सर्जिकल आंकोलाजिस्ट डाॅ. साक्षी सिंघल के अनुसार पेलेट की चोट से अंधापन, लगातार दर्द, जोड़ों में जकड़न और पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिसार्डर (पीटीएसडी) जैसी मानसिक समस्याएं भी हो सकती हैं।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल वैशाली की क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट डाॅ. वंदना प्रकाश ने कहा कि ऐसी घटनाओं का मानसिक असर कई लोगों में लंबे समय तक बना रह सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर में धंसे हर पैलेट को निकालना जरूरी नहीं होता। उपचार मरीज की स्थिति और चोट की गंभीरता के आधार पर तय किया जाता है। संक्रमण से बचाव, टिटनेस का टीका, नियमित जांच और विशेष रूप से आंख की चोट के मामलों में लंबे समय तक फालोअप आवश्यक है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

