UPTTI कानपुर में तैयार हो रहा स्मार्ट बायोडिग्रेडेबल डायपर और सैनिटरी नैपकिन, भर जाने पर सेंसर देगा अलर्ट

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उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल टेक्नोलाजी संस्थान (यूपीटीटीआइ) में बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए एक विशेष स्मार्ट बायोडिग्रेडेबल डायपर और सैनिटरी नैपकिन तकनीक तैयार की जा रही है।

इस तकनीक के तहत डायपर में एक खास सेंसर लगाया जाएगा जो नमी का स्तर लगातार मापेगा। जैसे ही डायपर पूरी तरह भर जाएगा, यह मोबाइल एप या अंदर लगे अलार्म सिस्टम के जरिए अभिभावक या देखभाल करने वाले को तुरंत मैसेज भेज देगा।

इससे सही समय पर डायपर बदला जा सकेगा, जिससे त्वचा पर लाल चकत्ते, रैशेज और खतरनाक स्किन इंफेक्शन का खतरा खत्म हो जाएगा। साथ ही, बार-बार डायपर चेक करने के झंझट से भी मुक्ति मिलेगी।

इस प्रोजेक्ट के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) की रिसर्च प्रमोशन स्कीम-2025 के तहत 18.70 लाख रुपये का शोध अनुदान मंजूर किया गया है। यह शोध कार्य यूपीटीटीआइ के सहायक प्रोफेसर डा. शुभांकर मैती की देखरेख में पूरा होगा।

इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद ऐसा स्मार्ट बायोडिग्रेडेबल डायपर बनाना है जो अपनी पूरी क्षमता का सही इस्तेमाल कर सके। स्वीकृत राशि से डा. मैती और उनकी टीम अगले दो साल के भीतर इस तकनीक का पहला माडल (प्रोटोटाइप) तैयार करेगी और इसे बाजार में आम लोगों के लिए उतारने पर काम करेगी।

पुराने डायपर से पर्यावरण और सेहत दोनों को नुकसान

डा. मैती ने बताया कि मौजूदा समय में बाजार में मिलने वाले ज्यादातर डायपर और सैनिटरी नैपकिन में पेट्रोलियम और केमिकल से बने पालिमर का इस्तेमाल होता है। ये प्लास्टिक जैसे मटीरियल मिट्टी में गलती या सड़ती नहीं हैं, जिसके कारण ये पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुकी हैं।

दूसरी तरफ, सही समय पर डायपर बदलने की जानकारी न मिलने से छोटे बच्चों, बुजुर्गों और बिस्तर पर पड़े मरीजों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इससे बैक्टीरिया फैलते हैं और गंभीर इंफेक्शन हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस नई तकनीक में एक बेहद हल्का, लचीला और कम बिजली से चलने वाला स्मार्ट सेंसर इस्तेमाल होगा। यह सेंसर डायपर के अंदर गीलेपन के स्तर पर लगातार नजर रखेगा।

जैसे ही द्रव एक तय सीमा तक पहुंचेगा, सेंसर तुरंत एक्टिव हो जाएगा और स्मार्टफोन ऐप या बीप की आवाज के जरिए अलर्ट भेज देगा। इससे मरीज को बिना किसी परेशानी के तुरंत नया डायपर पहनाया जा सकेगा। यह तकनीक स्मार्ट टेक्सटाइल, स्वास्थ्य सेवाओं, इंटरनेट आफ थिंग्स (आइओटी) और पर्यावरण की सुरक्षा का एक बेहतरीन मिला-जुला रूप है।

डॉ. शुभांकर मैती ने बताया कि इस डायपर में तरल सोखने के लिए प्लास्टिक-आधारित केमिकल की जगह पेड़-पौधों और प्राकृतिक स्रोतों से खास पाउडर (बायोडिग्रेडेबल सुपर एब्जार्बेंट पालिमर) बनाया जाएगा। इसमें इंफेक्शन फैलाने वाले कीटाणुओं को खत्म करने के प्राकृतिक गुण भी होंगे।

यह कुदरती पालिमर आम डायपर के मुकाबले ज्यादा द्रव सोखने में सक्षम होगा और इस्तेमाल के बाद फेंकने पर अपने आप मिट्टी में घुल-मिल जाएगा।

पीटीटीआइ के निदेशक प्रो. जी. नलनकिल्ली ने कहा कि यह परियोजना संस्थान की शोध क्षमता को नई पहचान देगी और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत स्वदेशी स्वास्थ्य तकनीक विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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