एक राजकुमारी ने बनवाया था भारत का पहला AIIMS, 16 साल रहीं गांधी जी की सेक्रेटरी, पढ़ें ये अनसुनी कहानी

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क्या आप जानते हैं हमारे देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री एक महिला थीं? और इन्होंने ही हमारे देश का पहला एम्स बनवाया था? हम बात कर रहे हैं राजकुमारी अमृत कौर की। हालांकि, देश के लिए इनका योगदान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं था।

आज भले ही इतिहास के पन्नों में इनका नाम धुंधला हो रहा है, लेकिन देश के स्वतंत्रता संग्राम और विकास में इनकी भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता। एक राजघराने से ताल्लुक रखने के बावजूद इन्होंने सभी सुविधाओं को छोड़कर अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों के लिए भी उन्होंने खूब काम किया। आइए जानते हैं राजकुमारी अमृत कौर की कहानी।

राजघराने से स्वतंत्रता आंदोलन का सफर

राजकुमारी अमृतकौर का जन्म 2 फरवरी 1889 में लखनऊ में हुआ था और वे कपूरथला के शाही परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई इंग्लैंड के शेरबोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स में की और बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की।

जब वे पढ़ाई पूरी करके भारत लौटीं, तो देश में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था। इससे प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में कदम रखा, लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ तब आया, जब उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई।

16 सालों तक रहीं गांधी जी की सेक्रेटरी

1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान राजकुमारी अमृत कौर महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित हुईं और वे उस आंदोलन से जुड़ गईं। राजकुमारी गांधी जी के विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने राजसी पहनावा छोड़कर खादी अपना लिया और राजघराने की शान छोड़कर सादगी से जीने लगीं।

महात्मा गांधी के विचारों से वे इतनी प्रभावित हुईं कि वे लगभग 16 सालों तक महात्मा गांधी की सेक्रेटरी रहीं। इस दौरान उनके पत्रों का जवाब देने से लेकर आंदोलनों की प्लानिंग करने तक में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। भारत छोड़ो आंदोलन के बाद उन्हें 3 साल जेल में भी रहना पड़ा, लेकिन देश की स्वतंत्रता के लिए उनका जुनून कम नहीं हुआ।

देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तो देश के सामने भुखमरी, गरीबी और मलेरिया, टीबी जैसी महामारियों जैसी गंभीर चुनौतियां थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उनके काम से काफी प्रभावित हुए और उन्हें भारत के पहले स्वास्थ्य मंत्री का पद सौंपा। इस पद पर वे 10 सालों तक रहीं।

एम्स की स्थापना में योगदान

स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने देश को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) का तोहफा दिया। वे भारत के लिए ऐसा चिकित्सा संस्थान चाहती थीं, जहां देश के गरीबों को मुफ्त और बेहतरीन इलाज मिल सके। साथ ही, देश के डॉक्टरों को उच्च स्तर की शिक्षा मिल सके।

जब सरकार के पास एम्स जैसा संस्थान बनाने के लिए पर्याप्त बजट नहीं था, तो राजकुमारी अमृत कौर ने वैश्विक स्तर पर फंड जुटाने का काम शुरू किया। उन्होंने कई देशों और अंतरराष्ट्रीय फाउंडेशनों से मदद मांगी। यहां तक कि उन्होंने शिमला में स्थित अपना पुश्तैनी घर मैनरविले भी एम्स के डॉक्टरों और नर्सों के लिए दान कर दिया। साल 1956 में उनकी मेहनत रंग लाई और नई दिल्ली में एम्स की नींव पड़ी।

महिलाओं के अधिकार

राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य के क्षेत्र के साथ-साथ महिलाओं के अधिकार और सामाजिक सुधार के लिए भी काफी काम किया है। उन्होंने महिलाओं को समान अधिकार दिलाने और बाल विवाह को रोकने के लिए आवाज उठाई। उन्होंने ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC) की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई।

देश के नाम किया अपना जीवन

साल 1964 में 6 फरवरी को राजकुमारी अमृतकौर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने कभी शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया।

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