ऊंची चौखट से बड़े आंगन तक… पुराने घरों की ये खासियतें नए जमाने में अब बन गई हैं इतिहास
पहले के जमाने में बनाए जाने वाले घर आज के घरों से काफी अलग हुआ करते थे। पुराने जमाने के घरों में कई ऐसी चीजें देखने को मिलती थी, अब मुश्किल से ही कहीं दिखाई देती हैं।
अगर आपको अपनी दानी-नानी के जमाने के घर याद होंगे, तो आपने उनमें कई ऐसी चीजें देखी होंगी कि जो आप अपने घरों में नहीं देख पाते होंगे। आज इस आर्टिकल में हम आपको इन्हीं चीजों के बारे में विस्तार बताएंगेजो पुराने घरों का जरूरी हिस्सा हुआ करती थीं, लेकिन आज के घरों में देखने को भी नहीं मिलतीं।
घर के बीच आंगन
पुराने घरों के ठीक बीचों-बीच आंगन जरूर होता था। ये खुली जगह घर का सोशल पॉइन्ट हुआ करती थी। घर की पूजा-पाठ का कार्यक्रम, दोपहर में पापड़ या अचार सुखाना और रात को पूरे परिवार के साथ बैठकर बातें करना, ये सबकुछ आंगन में ही हुआ करता था। आज के घरों में आंगन देखने को नहीं मिलता, लेकिन पुराने घरों का ये जरूरी हिस्सा होता था।
घर के बाहर चबूतरा
घर के दरवाजे के बाहर एक ऊंचा प्लैटफॉर्म बनाया जाता था, जिसे चबूतरा कहते हैं। शाम होते ही मोहल्ले के लोग यहां इकट्ठा होते और बातें करते थे। राह चलते राहगीर यहां सुस्ताने के लिए बैठते, कोई दूर का मेहमान आया है, तो उसे भी चबूतरे पर बैठाया जाता था। घर की प्राइवेसी के लिए बना चबूतरा पुराने घरों में जरूर बनाया जाता था।
दो पल्ले के भारी दरवाजे
पुराने घरों के मुख्य दरवाजे सागौन या शीशम की भारी लकड़ी से बनाए जाते थे। ये दरवाजे दो पल्ले के बनाए जाते थे, ताकि भारी लकड़ियों का वजन बांटा जा सके और दरवाजा कुंडे से निकल न जाए। घर की सुरक्षा और प्राइवेसी के लिए भी दो पल्ले वाला दरवाजा बनवाया जाता था। आज के घरों में ऐसे दरवाजे देखने को नहीं मिलते। ये दरवाजे प्लाई के होते हैं और सिंगल पैनल के होते हैं, लेकिन पुराने घरों में दो पल्ले के दरवाजे होते थे, जिन पर पीतल की भारी सांकल लगे होते थे।
ऊंची चौखट
दो पल्लों के दरवाजे के साथ घर की चौखट भी लकड़ी की होती थी और ऊंची बनाई जाती थी। ऊंची चौखट घर में धूल-मिट्टी, कीड़े-मकौड़े और बारिश का पानी आने से रोकती थी। चौखट को घर की मर्यादा का प्रतीक भी माना जाता था। इसलिए चौखट की पूजा की जाती थी। हालांकि, आज के घरों में ऊंची चौखट देखने को नहीं मिलती।
ऊंची खिड़कियां और रोशनदान
पुराने समय में घर को ठंडा रखने के लिए एसी-कूलर नहीं होते थे। इसलिए घर की खिड़कियां ऊंची बनाई जाती थीं, ताकि अंदर की गर्म हवा बाहर निकल जाए और घर में ठंडी हवा का फ्लो बना रहे। घर में रोशनी के लिए भी खिड़कियां और रोशनदान बनाए जाते थे, ताकि दिन के समय दीया जलाने की जरूरत न पड़े और सूरज की रोशनी से घर में उजाला रहे।
ताख या आला
पुराने समय में आज की तरह चौबीस घंटे बिजली नहीं होती थी। इसलिए दीवारों के बीच छोटे-छोटे अलमारी जैसी नक्काशीदार जगह बनाई जाती थी, जिसे ताख या आला या दीवट कहा जाता था। शाम होते ही मिट्टी के दीये या लालटेन इसी ताख पर रखे जाते थे, ताकि घर में रोशनी बनी रही। आज इनकी जरूरत खत्म हो गई है। इसलिए मॉडर्न घरों में ताख देखने को नहीं मिलती।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

