50 पैसे के टोकन, मारियो और साइबर कैफे: कुछ ऐसा था हमारे बचपन का ‘गेमिंग एरा’
अगर आप 20वीं शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में जन्मे और तब के शहरी भारत में पले-बढ़े हैं, तो विज्ञान के एक ऐसे अनोखे चमत्कार से आपका पाला जरूर पड़ा होगा, जिसका किसी किताब में जिक्र नहीं था।
वह था-प्लास्टिक की एक पीली, आयताकार वीडियो गेम कैसेट को कंसोल से बाहर निकालना, उसके निचले हिस्से पर फेफड़ों की पूरी ताकत लगाकर एक गहरी फूंक मारना और उसे वापस स्लाट में धकेल देना।
टीवी स्क्रीन पर झिलमिलाती रेखाएं गायब हो जाती थीं और खेल दोबारा शुरू हो जाता था। इस देसी जुगाड़ का विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं था, पर यह काम सौ फीसदी करता था।
गली मोहल्लों का टशन
यह उन दिनों की बात है जब टीवी एक लक्जरी आइटम था और इसकी रंगीन स्क्रीन पर दूरदर्शन के अलावा कुछ और देखना किसी सपने जैसा था। तभी शहरी बस्तियों में एक नई किस्म की दुकानें खुलीं, जिन्हें कहा जाता था वीडियो गेम पार्लर। वहां हवा में अजीब सा रोमांच और काउंटर पर सिक्कों की खनक तैरती थी।
आमतौर पर अठन्नी कहे जाने वाले पचास पैसे या एक रुपये का एक टोकन देकर बच्चे अमेरिकी कंपनी अटारी की ‘स्पेस वार’ या ‘स्ट्रीट फाइटर’ की दुनिया में दाखिल होते थे। ये शुरुआती आर्केड गेम गहरी हरी स्क्रीन पर काले डिजिटल ग्राफिक्स जैसे होते थे, मगर इनमें हवाई जहाजों से लेकर स्पेसशिप तक को मार गिराने का रोमांच भरपूर था।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

