50 पैसे के टोकन, मारियो और साइबर कैफे: कुछ ऐसा था हमारे बचपन का ‘गेमिंग एरा’

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अगर आप 20वीं शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में जन्मे और तब के शहरी भारत में पले-बढ़े हैं, तो विज्ञान के एक ऐसे अनोखे चमत्कार से आपका पाला जरूर पड़ा होगा, जिसका किसी किताब में जिक्र नहीं था।

वह था-प्लास्टिक की एक पीली, आयताकार वीडियो गेम कैसेट को कंसोल से बाहर निकालना, उसके निचले हिस्से पर फेफड़ों की पूरी ताकत लगाकर एक गहरी फूंक मारना और उसे वापस स्लाट में धकेल देना।

टीवी स्क्रीन पर झिलमिलाती रेखाएं गायब हो जाती थीं और खेल दोबारा शुरू हो जाता था। इस देसी जुगाड़ का विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं था, पर यह काम सौ फीसदी करता था।

गली मोहल्लों का टशन

यह उन दिनों की बात है जब टीवी एक लक्जरी आइटम था और इसकी रंगीन स्क्रीन पर दूरदर्शन के अलावा कुछ और देखना किसी सपने जैसा था। तभी शहरी बस्तियों में एक नई किस्म की दुकानें खुलीं, जिन्हें कहा जाता था वीडियो गेम पार्लर। वहां हवा में अजीब सा रोमांच और काउंटर पर सिक्कों की खनक तैरती थी।

आमतौर पर अठन्नी कहे जाने वाले पचास पैसे या एक रुपये का एक टोकन देकर बच्चे अमेरिकी कंपनी अटारी की ‘स्पेस वार’ या ‘स्ट्रीट फाइटर’ की दुनिया में दाखिल होते थे। ये शुरुआती आर्केड गेम गहरी हरी स्क्रीन पर काले डिजिटल ग्राफिक्स जैसे होते थे, मगर इनमें हवाई जहाजों से लेकर स्पेसशिप तक को मार गिराने का रोमांच भरपूर था।

फिर आज से चालीस साल पहले 1986 में आया वीडियो गेमिंग की दुनिया का सबसे बड़ा धमाका, जब ताश बनाने के लिए मशहूर जापान की निन्टेंडो ने 8 बिट सिस्टम वीडियो गेम कंसोल बनाकर बहुत बड़ा दांव खेला, जिसकी अगुआई कर रहा था ‘मारियो’!

सस्ते कंसोल की कमान

‘मारियो’ के रंग-बिरंगे ग्राफिक्स, शानदार एनिमेशन और बेहतरीन बैकग्राउंड्स ने जैसे बच्चों के लिए गेमिंग की दुनिया बदल दी। ‘सुपर मारियो ब्रदर्स’ की राजकुमारी को बचाने के लिए पूरा दिन लगा देना, उन दिनों बचपन का सबसे कीमती मगर डांट खाने वाला हिस्सा था।

मगर असली निन्टेंडो कंसोल वीडियो गेम पार्लर चलाने वालों की पहुंच और जेब से बहुत दूर थे, इसलिए चीनी जुगाड़ और दिल्ली के पालिका बाजार या मुंबई के लैमिंगटन रोड जैसे बाजारों ने कमान संभाली। समुराई, मीडिया और टर्मिनेटर जैसे चीनी कंसोल दुकानों में ही नहीं, घरों में भी आए।

‘सर्कस’ से लेकर ‘कोंट्रा’ और ‘अलादीन’ तक गेम इतने कि आप गिनते-गिनते थक जाएं और मजे की बात ये कि अगर सब चलाने पर आ जाएं तो 999 गेम्स की कार्टिज में वही 20-25 गेम घूम-फिर कर, ग्राफिक्स और नाम बदल कर चले आते थे!

कठिन लेवल्स के जुगाड़

दिलचस्प बात यह है कि ‘सुपर मारियो ब्रदर्स’ में कोई पारंपरिक कीबोर्ड चीट कोड नहीं था, लेकिन भारतीय बच्चों ने इसमें दो लाइफ हैक्स ढूंढ निकाले थे। पहला था-इन्फिनिट लाइव्स ट्रिक, जिसमें वर्ल्ड 3-1 की आखिरी सीढ़ियों पर कछुए को उसी के कवच में बंद करके, उस पर लगातार बाउंस करते रहना होता था।

इससे स्क्रीन पर वन अप की बाढ़ आ जाती थी और मारियो को 99 से ज़्यादा जिंदगियां मिल जाती थीं। दूसरा था-टाइम ट्रैवल, जहां वर्ल्ड 1-2 की छत के ऊपर दौड़ते हुए सीक्रेट पाइप मिलते थे, जो सीधे वर्ल्ड 4 या 6 में पहुंचा देते थे।

इसी तरह कोनामी कोड से ‘कोंट्रा’ में तो 3 की जगह 30 लाइफ मिल जाती थीं, जो गोलाबारी को झेलते हुए आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त थीं।

साइबर कैफे का दौर

21वीं शताब्दी के आते-आते तकनीक ने करवट बदली। कंप्यूटर की एंट्री हुई और खुलने लगे साइबर कैफे। बीस रुपये घंटे के किराए पर मिलने वाले इन केबिन्स ने तब आज के पबजीनुमा ‘काउंटर स्ट्राइक’ जैसे लोकल एरिया नेटवर्क गेम्स से भारतीय किशोरों को मनोरंजन का नया स्वाद दिया।

वहीं ‘स्पेस वार’ और ‘मारियो’ के संग बड़ी हुई पीढ़ी अब दफ्तर के कंप्यूटर पर ‘जीटीआर-2’ और एंजेलिना जोली के डिजिटल अवतार में ‘टूंब रेडर’ खेल रही थी।उसी दौर में सोनी ने प्लेस्टेशन 2 भारत में उतारा।

यह वह वक्त था जब मरते हुए टामी वर्सेटी की लाइफ बचाने के लिए, आसमान से सीधे मिलिट्री टैंक गिराने के लिए या गाड़ियों को हवा में उड़ाने के लिए ‘जीटीए वाइस सिटी’ के चीट कोड्स बच्चों की जुबान पर रटे थे।

मोबाइल हुई गेमिंग

फिर आया वर्ष 2016, जब रिलायंस जियो के आने से इंटरनेट का डेटा पानी की तरह बहने लगा और सस्ते स्मार्टफोन्स सुलभ होने लगे। अब गेमिंग किसी केबिन की बंधक नहीं थी, मोबाइल के साथ उसके भी पांव लग गए। ‘पबजी’ और ‘फ्री फायर’ का तूफान आया।

यूट्यूब पर लाइव गेमिंग स्क्रीन्स सजीं। मगर असली मजा तो यह है कि अब हम वर्चुअल रियलिटी के नाम पर सिर्फ विदेशी गेम्स खेलने वाला बाजार नहीं हैं। पुणे के एक छोटे स्टूडियो ने ‘राजी: एन एंशिएंट एपिक’ नाम का गेम बनाकर दुनिया को चौंका दिया है।

आज भारतीय गेम डेवलपर्स ‘कमला’ जैसे हारर गेम्स और ‘मुंबई गलीज’ जैसे ओपन-वर्ल्ड गेम्स बना रहे हैं, जिनमें हमारी अपनी उन्हीं गलियों की खुशबू है, जहां हम कभी मारियो की राजकुमारी को ड्रैगन से बचाया करते थे!

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