रील्स के दौर में रियल रिश्तों की जरूरत, जागरण फिल्म फेस्टिवल में शिक्षाविदों ने रखी बेबाक राय

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 डिजिटल युग में सूचना तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन सही और गलत के बीच अंतर करना चुनौती बनता जा रहा है। आज इंटरनेट मीडिया, रील्स, ओटीटी और एआइ युवाओं की सोच को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन युवा मन का निर्माण डिजिटल माध्यमों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

परिवार, शिक्षक और समाज को मिलकर युवाओं में विवेक, आलोचनात्मक सोच, सही-गलत की पहचान करने की क्षमता और नैतिक मूल्यों का विकास करना होगा। यह विचार शिक्षाविदों ने रजनीगंधा प्रेजेंट्स जागरण फिल्म फेस्टिवल के तहत ”युवा मन की रचना किसके हाथ” विषय पर आयोजित परिचर्चा में साझा किए।

युवाओं को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाना होगा

दैनिक जागरण के ओखला स्थित कार्यालय में शुक्रवार को आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों ने माना कि तकनीक को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन युवाओं को उसे सही दिशा में इस्तेमाल करना सिखाना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा, आपसी संवाद और जीवन मूल्यों से जुड़ाव से ही ऐसी पीढ़ी तैयार हो सकती है जो राष्ट्र निर्माण में सार्थक भूमिका निभा सके।

दयाल सिंह कॉलेज के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर फिरोज आलम ने कहा कि पहले गुरु-शिष्य परंपरा और महापुरुष प्रेरणास्रोत होते थे, जबकि आज इंटरनेट मीडिया यह भूमिका निभा रहा है। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान को दूर तक पहुंचाया है, लेकिन इससे युवाओं में अकेलापन, संवादहीनता और डिजिटल निर्भरता बढ़ी है। रील्स सूचना देती हैं, लेकिन आलोचनात्मक सोच विकसित नहीं करतीं, इसलिए शिक्षकों और अभिभावकों को यह भूमिका निभानी होगी।

इंटरनेट पर घंटों बिता रहे हैं युवा

किरोड़ीमल कॉलेज के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. वेद प्रकाश ने कहा कि आज युवा इंटरनेट पर घंटों बिता रहे हैं, जबकि उनका मस्तिष्क विकास पुस्तकों, संवाद और संस्कारों से होना चाहिए। रील संस्कृति युवाओं को वास्तविक जीवन से दूर कर रही है। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे महानायक रील्स से नहीं, रियल संघर्षों से बने थे। युवाओं को महापुरुषों के जीवन और सनातन मूल्यों से जोड़ना जरूरी है।

श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर ऋत्विक भट्टाचार्जी ने कहा कि इंटरनेट मीडिया के लिए सकारात्मक और सार्थक कंटेंट तैयार करने की दिशा में कार्य हो और सरकार ओटीटी जैसे मंच के लिए मानक निर्धारित करे। श्री अरबिंदो कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष डा. हंसराज सुमन ने कहा कि व्यक्ति का निर्माण शिक्षा, वातावरण और संस्कार से होता है। शिक्षकों व अभिभावकों को युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा। किरोड़ीमल कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अनंत प्रकाश ने इंटरनेट मीडिया को इनविजिबल यूनिवर्सिटी बताते हुए कहा कि यह मंच युवाओं के विचारों को प्रभावित कर रहा है।

युवाओं को डिजिटल उपवास की जरूरत है

ट्रोलिंग, मीम संस्कृति और वायरल कंटेंट के दौर में कंटेंट क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स की सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है। शारदा विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर प्रो. राशिद हाशमी ने युवाओं को हाशिये पर रखने के बजाय उनके साथ संवाद बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को डिजिटल उपवास की भी जरूरत है।

आर्यभट्ट कालेज में राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. राम आनंद शर्मा ने कहा कि युवाओं के मन का निर्माण ही भारत का भविष्य निर्माण है। विकसित भारत-2047 का सपना साकार करना है तो परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर काम करना होगा। सत्र का संचालन पीजीडीएवी कालेज में हिंदी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. श्रुति रंजना मिश्रा ने किया।

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