बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी की उज्जैनिया पट्टी के महांत संतरामदास का पूर्वाह्न साकेतवास हो गया। वह 87 वर्ष के थे। गत कुछ माह से बीमार महांत का लखनऊ में इलाज चल रहा था। वैष्णव आस्था के अनुरूप अंतिम श्वांस अयोध्या में ही निकले, इसी भावना को ध्यान में रख कर वह दो दिन पूर्व ही अत्यंत आग्रहपूर्वक अयोध्या लौटे थे।
उनके साकेतवास की सूचना संत समाज और उनसे जुड़े विशाल परिकर को शोकाकुल करने वाली रही। संत परंपरा के अनुरूप उन्हें रथ में प्रतिष्ठित कर हनुमानगढ़ी से सरयू तट तक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
यद्यपि उन्हें संत परंपरा के अनुसार सरयू में जल समाधि देने की बजाय व्यक्तिगत इच्छा को ध्यान में रख कर उनका अग्नि संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार उनके तीनों प्रमुख शिष्य नंदरामदास, उमारामदास एवं राजूदास ने सामूहिक रूप से किया।
अंतिम प्रणाम करने वालों में पूर्व सांसद लल्लू सिंह, निर्वाणी अनी के पूर्व प्रधानमंत्री महांत माधवदास, हनुमानगढ़ी के सरपंच महांत रामकुमारदास, लक्ष्मणकिलाधीश महांत मैथिलीरमणशरण, शीर्ष कथाव्यास एवं हनुमन्निवास के महांत आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण, हनुमानगढ़ी से जुड़े महांत रामकरनदास मौजूद रहे।
इसके अलावा, हनुमानगढ़ी के मुख्य पुजारी रमेशदास, मिथिलामणिमंडप के महांत अंजनीशरण, हनुमतसदन के महांत अवधकिशोरशरण, पूर्व महापौर रिषिकेश उपाध्याय, जिला पंचायत अध्यक्ष के प्रतिनिधि आलोक सिंह रोहित, भाजपा नेता अवधेश पांडेय बादल, भाजपा के पूर्व महानगर अध्यक्ष अभिषेक मिश्र आदि रहे।
सत्यनिष्ठा एवं बेबाकी के लिए जाने जाते रहे
बिहार प्रांत के भोजपुर जिलांतर्गत ग्राम डुमरी में पैदा हुए संतरामदास ने तरुणाई में ही साधु जीवन अंगीकार किया। उन्हें हनुमानगढ़ी में अति प्रभावी महांत सरयूदास से दीक्षित होने का अवसर मिला और वह जल्दी उनके कृपापात्र एवं उत्तराधिकारी के रूप में उभरे।
1986 में वह हनुमानगढ़ी की चार प्रतिष्ठापूर्ण पट्टी में से एक के महांत भी बनाए गए। गो-साधु सेवी संतरामदास अपनी सत्यनिष्ठा एवं बेबाकी के भी लिए जाने जाते रहे। उनके प्रशंसकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल थे और अपनी यात्रा के दौरान उनसे भेंट करना नहीं भूलते थे।


