यूपी में 24 वर्ष पुराना कोचिंग कानून बदलने की जरूरत, सिर्फ शिक्षकों पर रोक तक सीमित हैं नियम

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प्रदेश में लगातार बढ़ते कोचिंग संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 2002 में लागू किया गया उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम में अब बदलाव मांग रहा है। यह तो अब बदलते समय की जरूरतों के हिसाब से अधूरा नजर आ रहा है।

प्रदेश में 24 वर्ष पहले बने इस कानून का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को निजी कोचिंग देने या चलाने से रोकना था, लेकिन आज तेजी से बढ़ते कोचिंग कारोबार, आनलाइन पढ़ाई, बढ़ती फीस और छात्रों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों को यह कानून पूरी तरह शामिल नहीं करता।

प्रदेश सरकार को उस समय शिकायतें मिली थीं कि कई विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के शिक्षक निजी कोचिंग में ज्यादा समय दे रहे हैं, जिससे उनके नियमित शिक्षण कार्य पर असर पड़ रहा है। इसी को देखते हुए 27 जून 2002 को यह कानून लागू किया गया।

कानून के अनुसार किसी भी विषय में तीन या उससे अधिक विद्यार्थियों को नियमित रूप से पढ़ाना, प्रशिक्षण देना या मार्गदर्शन करना कोचिंग माना जाएगा। हालांकि, किसी शिक्षक द्वारा कभी-कभार दी गई शैक्षणिक सलाह या मार्गदर्शन को कोचिंग की श्रेणी में नहीं रखा गया है।

स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय और सरकार से मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों के साथ ललित कला, सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर विज्ञान, टंकण, आशुलिपि जैसी तकनीकी शिक्षा देने वाले संस्थान इसके दायरे से बाहर हैं। किसी शैक्षणिक संस्था का शिक्षक या कर्मचारी नहीं होने वाला व्यक्ति सक्षम अधिकारी से पंजीकरण कराकर ही कोचिंग केंद्र चला सकता है।

संचालक को यह लिखित आश्वासन देना होता है कि वह किसी शिक्षक या कर्मचारी को कोचिंग के लिए नियुक्त नहीं करेगा। सक्षम अधिकारी को कोचिंग केंद्रों के निरीक्षण, पंजीकरण निलंबित करने या रद्द करने का अधिकार है, हालांकि कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है।

किसी भी शैक्षणिक संस्था का शिक्षक या कर्मचारी अपनी संस्था के अलावा कहीं और कोचिंग नहीं दे सकता और न ही कोचिंग केंद्र चला सकता है या उससे अलग से कोई शुल्क ले सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब यह कानून बना था तब आनलाइन कोचिंग और बड़े निजी कोचिंग संस्थानों का इतना विस्तार नहीं था।

इसी कारण इसमें कोचिंग फीस तय करने, फीस वापसी, छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, अग्नि सुरक्षा, कक्षा में छात्रों की संख्या, भ्रामक विज्ञापन और शिकायत निवारण की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। जुर्माने की राशि भी आज के बड़े कोचिंग कारोबार की तुलना में कम मानी जाती है।

नियम तोड़ने पर इतना जुर्माना

बिना पंजीकरण कोचिंग चलाने पर अधिकतम एक लाख रुपये तक जुर्माना।
शिक्षक या कर्मचारी के नियमों का उल्लंघन करने पर 50 हजार रुपये तक जुर्माना।
निरीक्षण में मिली कमियों को तय समय में दूर न करने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माना।

प्रदेश में सिर्फ 3152 कोचिंग संस्थान पंजीकृत

उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम, 2002 के तहत प्रदेश में 3152 कोचिंग संस्थान पंजीकृत हैं, उच्च शिक्षा की विशेष सचिव निधि श्रीवास्तव ने सभी जिलाधिकारियों को कोचिंग संस्थानों का व्यापक सर्वे कराने के निर्देश दिए हैं। सर्वे में यह पता लगाया जाएगा कि कौन से संस्थान अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं।

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