सिंगरौली। नगर पालिका निगम सिंगरौली में लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित तालाब गहरीकरण, रेलिंग एवं अन्य निर्माण कार्यों के टेंडर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। निगम के एक जिम्मेदार अधिकारी पर टेंडर की शर्तों में कथित रूप से मनमाना बदलाव कर प्रतिस्पर्धा को सीमित करने तथा एक विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं। मामले को लेकर असंतुष्ट प्रतिभागी ठेकेदार अब न्यायालय की शरण लेने की तैयारी में बताए जा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, नगर पालिका निगम सिंगरौली द्वारा हरई गायत्री तालाब एवं हरिहर रोड स्थित तालाब के गहरीकरण, रेलिंग निर्माण और अन्य विकास कार्यों के लिए लगभग 4 करोड़ 99 लाख रुपये की अनुमानित लागत का टेंडर जारी किया गया था। इस कार्य में कई निर्माण एजेंसियों एवं ठेकेदारों ने रुचि दिखाई और टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया।

टेंडर की शर्तों में बदलाव बना विवाद की वजह
सूत्रों के अनुसार, सामान्यतः इस प्रकार के निर्माण कार्यों में पात्रता निर्धारित करते समय पिछले तीन वित्तीय वर्षों का औसत वार्षिक टर्नओवर कार्य की अनुमानित लागत के लगभग 30 से 40 प्रतिशत के आसपास रखा जाता है। इस आधार पर लगभग 5 करोड़ रुपये के कार्य के लिए डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक का औसत वार्षिक टर्नओवर पर्याप्त माना जाता है।
लेकिन आरोप है कि निगम के जिम्मेदार अधिकारी संतोष पांडे ने टेंडर की शर्त क्रमांक-8 में बदलाव करते हुए पात्रता के लिए पिछले तीन वित्तीय वर्षों का वार्षिक टर्नओवर 20 करोड़ रुपये से कम नहीं होने की शर्त जोड़ दी। इसी शर्त को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या 5 करोड़ रुपये के कार्य के लिए 20 करोड़ रुपये का टर्नओवर अनिवार्य करना उचित और व्यावहारिक था?

प्रतिस्पर्धा खत्म करने का आरोप
असंतुष्ट प्रतिभागियों का आरोप है कि उक्त शर्त के कारण अधिकांश स्थानीय एवं पात्र ठेकेदार तकनीकी रूप से अपात्र घोषित हो गए। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि टेंडर की शर्तों में किया गया यह बदलाव प्रतिस्पर्धा को सीमित करने और एक विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया। बताया जा रहा है कि पात्रता परीक्षण के दौरान कई प्रतिभागियों के टेंडर निरस्त कर दिए गए और अंततः एनपीसीसी (NPCC) नामक कंपनी ही एकमात्र पात्र बोलीदाता के रूप में बची।
बिलो रेट को लेकर भी उठे सवाल
नगर निगम में आमतौर पर प्रतिस्पर्धा अधिक होने के कारण कई निर्माण कार्यों में ठेकेदार अनुमानित लागत से 20, 30 या 40 प्रतिशत तक कम दरों पर निविदाएं प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इस मामले में आरोप है कि चयनित कंपनी ने अनुमानित लागत से केवल लगभग 4 प्रतिशत कम दर प्रस्तुत की, जबकि 18 प्रतिशत जीएसटी अतिरिक्त रखा गया। इसी आधार पर विरोधी पक्ष यह सवाल उठा रहा है कि यदि प्रतिस्पर्धा बनी रहती तो निगम को और अधिक वित्तीय लाभ मिल सकता था।

हाईकोर्ट जाने की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया से बाहर हुए कुछ प्रतिभागी ठेकेदार अब पूरे मामले को लेकर कानूनी सलाह ले रहे हैं और उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता की जांच होनी चाहिए। वहीं, यह भी चर्चा है कि विवाद बढ़ने के बाद संबंधित पक्षों के बीच समझौते के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
पारदर्शिता पर उठे सवाल
मामले को लेकर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि टेंडर शर्तों में वास्तव में ऐसा बदलाव किया गया है जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई हो, तो इसकी स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। दूसरी ओर यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं तो निगम प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की आशंका या भ्रम की स्थिति न रहे।
जांच की मांग तेज
स्थानीय स्तर पर अब मांग उठ रही है कि पूरे टेंडर प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि पात्रता शर्तों में बदलाव किन परिस्थितियों में किया गया, क्या यह नियमों के अनुरूप था, और इससे प्रतिस्पर्धा तथा सरकारी राजस्व पर क्या प्रभाव पड़ा?


