907 करोड़ माफ होने से NPCL के 2.5 लाख उपभोक्ताओं का नुकसान

नोएडा पावर कंपनी लिमिटेड (NPCL) से जुड़े टैरिफ पुनरीक्षण मामले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। विद्युत नियामक आयोग द्वारा कंपनी के पांच वर्षों के टैरिफ आदेशों की समीक्षा के दौरान 907 करोड़ रुपये की सरप्लस धनराशि समायोजित किए जाने पर राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने गंभीर आपत्ति जताई है। परिषद का कहना है कि इस फैसले से लाखों उपभोक्ताओं के हित प्रभावित होंगे और उन्हें मिलने वाली बिजली दरों में राहत खत्म हो सकती है।

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अनुसार, एनपीसीएल पर उपभोक्ताओं की जो सरप्लस धनराशि निकल रही थी, उसमें से 907 करोड़ रुपये माफ किए जाने से करीब 2.5 लाख उपभोक्ताओं को सीधा नुकसान होगा। परिषद का दावा है कि इसी सरप्लस राशि के आधार पर उपभोक्ताओं को बिजली टैरिफ में लगभग 10 प्रतिशत की छूट मिल रही थी, जो अब समाप्त होने की आशंका है।

परिषद ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए और फैसले के खिलाफ अपील दायर करे। परिषद का मानना है कि यह मामला केवल वित्तीय नहीं, बल्कि लाखों उपभोक्ताओं के अधिकारों और हितों से जुड़ा हुआ है।

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि अपीलीय अधिकरण के आदेश के बाद आयोग ने एनपीसीएल के पिछले पांच वर्षों के टैरिफ आदेशों का पुनरीक्षण किया। इस प्रक्रिया में कई वित्तीय और नियामकीय मानकों में बदलाव किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 907 करोड़ रुपये की सरप्लस धनराशि को समायोजित कर दिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह पुनरीक्षण उपभोक्ता हितों के विपरीत है और इससे गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि पुराने और समाप्त हो चुके टैरिफ आदेशों का पुनरीक्षण सीमित दायरे में किया जाना चाहिए। इसके बावजूद इस मामले में व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण कर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय भार डालने की प्रक्रिया अपनाई गई है।

परिषद का कहना है कि यदि यह राशि उपभोक्ताओं के हित में बरकरार रखी जाती, तो बिजली उपभोक्ताओं को टैरिफ में राहत मिलती रहती। ऐसे में आयोग का यह निर्णय उपभोक्ताओं के आर्थिक हितों को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है।

फिलहाल इस मुद्दे को लेकर बिजली उपभोक्ताओं के बीच भी चिंता बढ़ गई है। अब सभी की निगाहें प्रदेश सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है तो इस पर अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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