टीकमगढ़ में मिला ज्ञान का खजाना: 150 साल प्राचीन ग्रंथ ने खोले भारतीय अश्व विज्ञान के रहस्य

ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत टीकमगढ़ में किए गए सर्वेक्षण में अब तक 75 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां सामने आई हैं। इन प्राचीन दस्तावेजों ने भारत की वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया है। पांडुलिपियों में चिकित्सा विज्ञान, खगोलशास्त्र, भाषा विज्ञान, तंत्र साधना और वैदिक परंपराओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज हैं। विशेष रूप से एक ग्रंथ में घोड़ों की नस्ल, पालन-पोषण और चिकित्सा संबंधी विस्तृत विवरण मिला है, जो भारतीय अश्व विज्ञान की समृद्ध परंपरा का प्रमाण माना जा रहा है।

सर्वेक्षण के दौरान संवत 1933 (1876 ई.) की एक महत्वपूर्ण पांडुलिपि मिली है। इसके एक हिस्से में भगवान शिव के महामृत्युंजय सहस्रनाम का उल्लेख है, जबकि दूसरे भाग में ‘मदन वाटिका’ नामक ग्रंथ संकलित है। मदन सिंह द्वारा रचित 153 पृष्ठों का यह ग्रंथ पूरी तरह घोड़ों की नस्लों, उनके पालन और उपचार पद्धतियों पर केंद्रित है।

‘मदन वाटिका’ में काबुल, कश्मीर, मुल्तान और पंजाब क्षेत्र की प्रमुख घोड़ा नस्लों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें घोड़ों की शारीरिक बनावट का मूल्यांकन ‘अंगुल’ माप प्रणाली से करने का उल्लेख है। सिर, गर्दन, चाल और पूंछ की संरचना के आधार पर उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता निर्धारित करने के मानक भी बताए गए हैं।

ग्रंथ में दांतों की जांच से घोड़े की उम्र का अनुमान लगाने, नाड़ी परीक्षण से स्वास्थ्य का आकलन करने तथा आंख, जीभ और व्यवहार के अवलोकन के जरिए रोग पहचानने की विधियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। श्वसन संबंधी रोग, पाचन विकार और ज्वर जैसी समस्याओं को पारंपरिक दोष सिद्धांत के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। साथ ही जड़ी-बूटी आधारित उपचारों और प्रक्रियात्मक चिकित्सा पद्धतियों का भी उल्लेख मिलता है।

केशवदास से तंत्र ग्रंथों तक मिली बहुभाषी विरासत

टीकमगढ़ से प्राप्त पांडुलिपियों में साहित्य, दर्शन और तंत्र परंपरा की भी समृद्ध झलक दिखाई देती है। इनमें महाकवि केशवदास की ब्रजभाषा रचना ‘विज पावनी/तरंगण’, तांत्रिक ग्रंथ ‘ज्ञानार्णव तंत्र’, ‘श्रीरुद्रयामल’ से उद्धृत ‘परमहंस स्तोत्र’ तथा भारवि के ‘किरातार्जुनीयम्’ पर आधारित समीक्षात्मक लेखन शामिल हैं। वहीं ‘नक्षत्र इष्टि प्रयोग’ जैसे ग्रंथ खगोलीय गणनाओं की जानकारी देते हैं और ‘नैमिषारण्य महात्म्य’ धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।

इन पांडुलिपियों में संस्कृत और ब्रजभाषा के साथ-साथ गुजराती, पंजाबी, पारसी और मारवाड़ी भाषाओं के निर्देश भी दर्ज हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह उस समय के व्यापक सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्कों का सशक्त प्रमाण है।

ब्रिटिश लेड पेपर पर लिखे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज

सर्वेक्षण में मिली एक पांडुलिपि विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे उच्च गुणवत्ता वाले आयातित ब्रिटिश ‘लेड पेपर’ पर लिखा गया है। इस कागज पर ‘टीएच सांडर्स 1886’ का स्पष्ट वाटरमार्क अंकित मिला है, जिससे संकेत मिलता है कि इसका निर्माण इंग्लैंड में हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि औपनिवेशिक काल में इस प्रकार के प्रीमियम कागज का उपयोग महत्वपूर्ण अभिलेखों और आधिकारिक ग्रंथों के लिए किया जाता था। बरतानिया शैली के वाटरमार्क और बारीक लेड लाइनें इसकी गुणवत्ता और ऐतिहासिक महत्व को और अधिक प्रमाणित करती हैं।

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