जल, जंगल और जमीन के रक्षक झारखंड के आदिवासी समुदायों का सदियों से संरक्षित ‘जाहेर थान’ अब दुनिया के सामने पर्यावरण संरक्षण के एक वैज्ञानिक माडल के रूप में सामने आया है। इसका खुलासा संताल परगना प्रमंडल के पाकुड़ जिले के जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी सौरभ चंद्रा की अगुवाई में शोध कर रहे तीन सदस्यीय टीम ने किया है।
इस पर तैयार शोध पत्र हाल ही में ‘इंटरनेशनल जर्नल आफ साइंटिफिक रिसर्च एंड टेक्नोलाजी में प्रकाशित हुआ है। शोध रिपोर्ट के मुताबिक पाकुड़ जिले के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित आदिवासियों के 100 साल पुराना जाहेर थान में खड़े सखुआ के वृक्ष भारी मात्रा में कार्बन सोखकर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
पाकुड़ के छह प्रखंड के 46 जाहेर थान में शोध के दौरान यह तथ्य पुष्ट हुई है कि लगभग 31,080.04 टन प्रति हेक्टेयर कार्बन डायआक्साइड सोखने व 17625 टन प्रति हेक्टेयर तक कार्बन भंडारण की क्षमता इन उप वनों में है। यह उपवन मात्र आस्था का केंद्र नहीं बल्कि उच्च क्षमता वाले ‘कार्बन सिंक’ हैं। यह आंकड़ा पर्यावरणविदों के लिए बेहद उत्साहजनक है।
कहां कितना कार्बन है जमा
शोध दल में शामिल डीएफओ सौरभ चंद्रा, सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीच्युट रांची के फंक्शनल एरिया एक्सपर्ट संजय खाखा एवं वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अली जब्रान की टीम ने शोध के दौरान इन उपवनों को चार अलग-अलग श्रेणियों (कार्बन पूल) में शोध अध्ययन किया।
जिसमें जमीन के ऊपर का बायोमास कुल कार्बन स्टाक में सबसे बड़ा हिस्सा 79 प्रतिशत पेड़ों के तनों और शाखाओं का है। जमीन के नीचे का बायोमास लगभग 18.8 प्रतिशत हिस्सा जड़ों में समाहित है। मिट्टी का आर्गेनिक कार्बन 1.8 प्रतिशत कार्बन मिट्टी के भीतर सुरक्षित है।
पत्तों का कचरा 0.4 प्रतिशत हिस्सा जमीन पर गिरे पत्तों और टहनियों के जरिए चक्रित हो रहा है। अध्ययन में पाया गया कि कुल जमा बायोमास 7,845.08 टन था, जबकि कुल कार्बन स्टाक 17,625 टन प्रति हेक्टेयर पाया गया। शोध में ‘वन-वे एनोवा’ और ‘ट्यूकी टेस्ट’ जैसे जटिल सांख्यिकीय तरीकों का उपयोग किया गया।
विश्लेषण में पाया गया कि पेड़ों के ऊपर और नीचे का बायोमास मिट्टी के कार्बन की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है। पियर्सन कोरिलेशन एनालिसिस से पुष्टि हुई कि पेड़ों की सघनता जितनी अधिक होगी मिट्टी में कार्बन और पोषक तत्वों की मात्रा भी उतनी ही बेहतर होगी। इसकी वजह से यह भी साबित हो सका कि इन उपवनों का इकोलाजिकल ढांचा बहुत मजबूत है।
क्यों खास हैं पाकुड़ के ये ‘जाहेर थान’
पाकुड़ जिले का भूगोल पहाड़ियों और उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी का मिश्रण है। यहां ‘नार्दर्न ड्राई पेनिनसुलर साल फारेस्ट’ पाए जाते हैं। स्थानीय समुदायों ने ‘जहेर एरा’ (देवी) की पूजा के माध्यम से इन जंगलों को मानवीय हस्तक्षेप से बचाकर रखा है। यहां न केवल साल, बल्कि बहेड़ा, भेलवा और पलाश जैसे औषधीय पेड़ भी प्रचुर मात्रा में हैं।
‘क्लाइमेट चेंज’ से लड़ने का देसी तरीका
- अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष निकाला गया है कि यह पवित्र उपवन जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक प्राकृतिक हथियार है। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसके जरिए
- मिट्टी के कटाव को रुकता है। यह भूजल स्तर को भी बनाए रखने में मददगार है।
- यहां दुर्लभ पक्षियों और स्थानीय वन्यजीवों का वास है। खेती की पैदावार बढ़ाने में सहायक जैविक खाद भी यहां से प्रदान हो रहा है।


