सिंगरौली। जिले में कोयला परिवहन और डीओ (डिलीवरी ऑर्डर) संचालन से जुड़े कारोबारियों के बीच इन दिनों वन विभाग के एक कथित कर्मचारी को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। चर्चा है कि वन मंडल कार्यालय में कार्यरत एक तिवारी नामक कर्मचारी पर कुछ डीओ होल्डरों उनका नाम न छपने के शर्त पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि उक्त कर्मचारी वन मंडल अधिकारी के नाम पर कोयला उठाने वाले डीओ होल्डरों से प्रति टन 3 रुपये की वसूली करता है। इतना ही नहीं, मुलाकात और अन्य खर्चों के नाम पर भी कथित रूप से 5 हजार रुपये तक की राशि लिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।हालांकि, इन आरोपों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित कर्मचारी की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने आया है। लेकिन आरोपों की चर्चा ने कोयला परिवहन क्षेत्र में हलचल जरूर पैदा कर दी है।

डीओ होल्डरों में चर्चा, लेकिन सामने नहीं आए दस्तावेज
सूत्रों के अनुसार कुछ डीओ होल्डरों द्वारा अनौपचारिक रूप से यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि कोयला परिवहन से संबंधित गतिविधियों के दौरान विभिन्न मदों के नाम पर धनराशि की मांग की जाती है। आरोप यह भी है कि वसूली को विभागीय अधिकारियों के नाम से जोड़ा जाता है।हालांकि, अब तक किसी भी पक्ष द्वारा ऐसे आरोपों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई दस्तावेज या लिखित शिकायत सामने नहीं आई है। ऐसे में आरोपों की सत्यता की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
जानकारी लेने पहुंचे पत्रकार, लेकिन नहीं मिला स्पष्ट जवाब
मामले की सच्चाई जानने के लिए मंगलवार को जब संबंधित तिवारी नामक कर्मचारी से संपर्क किया गया। तो उन्होंने पहले व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद जानकारी देने की बात कही। इसके बाद वन मंडल कार्यालय वैढ़न पहुंचकर उनसे संपर्क करने का प्रयास किया गया, जहां शाम को विस्तृत जानकारी देने का आश्वासन दिया गया। लेकिन जब शाम को पुनः फोन के माध्यम से संपर्क किया गया तो संबंधित कर्मचारी ने अपनी माता जी की तबीयत खराब होने की बात कहते हुए रीवा जाने की जानकारी दी और कहा कि दो दिन बाद मुलाकात कर अपनी बात रखेंगे।
सवालों से बचने की कोशिश या महज संयोग?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। इस पूरे मामले के बाद जब भी वसूली संबंधी आरोपों पर जानकारी लेने का प्रयास किया गया, तब संबंधित कर्मचारी द्वारा स्पष्ट जवाब देने से बचने की कोशिश की गई। वहीं दूसरी ओर शायद संबंधित कर्मचारी का कहना है कि पारिवारिक कारणों से वह तत्काल जवाब देने की स्थिति में नहीं थे।
आखिर क्या है सच्चाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
- क्या वास्तव में डीओ होल्डरों से किसी प्रकार की वसूली की जा रही है?
- यदि हां, तो यह राशि किस आधार पर और किसके निर्देश पर ली जा रही है?
- वन विभाग के अधिकारियों को इस मामले की जानकारी है या नहीं?
- क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
- संबंधित कर्मचारी कब अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखेंगे?
जांच के बाद ही सामने आएगी हकीकत
फिलहाल, पूरा मामला आरोपों और चर्चाओं के दायरे में है। आरोप गंभीर हैं, इसलिए इनकी पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही संभव है। संबंधित कर्मचारी का विस्तृत पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।आगे जैसे ही संबंधित कर्मचारी का पक्ष सामने आता है वैसे अगले अंक में उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।


