महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों के प्रति जीरो टालरेंस की नीति को रेखांकित करते हुए झज्जर की एक विशेष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष अदालत) मोना सिंह की अदालत ने मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली एक महिला के अपहरण, दुष्कर्म के प्रयास और उसकी नृशंस हत्या के मामले में मुख्य आरोपित राज को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है।
इसके साथ ही अदालत ने मृतका के बेसहारा और अनाथ हो चुके नाबालिग बच्चों के पुनर्वास के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को 7 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करने का संवेदनशील फैसला भी लिया है।
पैसे के बहाने बुलाकर किया था अपहरण और मर्डर
पुरानी पुलिस प्राथमिकी के अनुसार, घटना की शुरुआत 15 फरवरी 2023 को हुई थी। दिल्ली के मंगोलपुरी निवासी व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी 36 वर्षीय बड़ी बहन किसी व्यक्ति से अपने पैसे वापस लेने की बात कहकर झज्जर के लिए निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी।
दिल्ली पुलिस द्वारा जब तकनीकी जांच और सीडीआर (काल डिटेल रिकार्ड) विस्तार खंगाली गई, तो मृतका की अंतिम लोकेशन झज्जर जिले के साल्हावास थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव रुड़ियावास में पाई गई।
निरंतर की गई जांच में सामने आया कि गांव रुड़ियावास निवासी राज ने महिला को पैसे देने के बहाने यहां पर बुलाया और उसका अपहरण कर खौफनाक वारदात को अंजाम दिया। दिल्ली में दर्ज की गई जीरो एफआईआर को बाद में साल्हावास थाने में स्थानांतरित कर कानूनी कार्रवाई शुरू की गई थी।
विभिन्न धाराओं में अदालत ने तय की सजा : अदालत में सरकार की ओर से लोक अभियोजक किरन चौधरी ने अचूक साक्ष्य और दलीलें पेश कीं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश मोना सिंह की अदालत ने आरोपित राज को दोषी पाते हुए विभिन्न धाराओं के तहत कठोर कारावास और जुर्माने की सजा तय की। अदालत के आदेशानुसार यह सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। जुर्माना न भरने की सूरत में दोषी को अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
| भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा | अपराध का विवरण | सजा (कारावास) | जुर्माना |
| धारा 302 | हत्या | उम्रकैद (आजीवन कारावास) | ₹25,000 |
| धारा 376 सहपठित धारा 511 | दुष्कर्म का प्रयास | 7 वर्ष का कठोर कारावास | ₹10,000 |
| धारा 365 | अपहरण (बंधक बनाने के उद्देश्य से) | 6 वर्ष का कठोर कारावास | ₹10,000 |
| धारा 201 | सबूत मिटाना या गलत जानकारी देना | 3 वर्ष का कठोर कारावास | ₹5,000 |
अनाथ बच्चों के दर्द पर अदालत का मानवीय दृष्टिकोण : इस फैसले में अदालत ने बेहद मानवीय रुख भी अपनाया है। न्यायाधीश ने अपने फैसले में विशेष रूप से उल्लेख किया कि मृतका अपने पति की मृत्यु के बाद मायके में रह रही थी और उसके पीछे उसके नाबालिग बच्चे हैं, जो अपनी मां की मृत्यु के बाद पूरी तरह बेसहारा हो गए हैं।
इन मासूम बच्चों के भविष्य और आर्थिक पुनर्वास को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने ”विपत्ति मुआवजा कोष” के तहत सात लाख रुपये की मुआवजा राशि मंजूर की है, जिसे झज्जर डीएलएसए द्वारा सीधे बच्चों के बैंक खाते में जमा करवाया जाएगा।


