सुहागिनें पूरी श्रद्धा और उमंग के साथ वट-सावित्री की पूजा कर रहीं हैं। बरगद के पेड़ों के नीचे सजी-धजी महिलाओं का जमावड़ा है।
इधर धनरुआ के निमड़ा गांव में वट सावित्री पूजा के दौरान एक अप्रिय घटना हो गई। सुबह करीब 10 बजे बरगद के पेड़ के नीचे पूजा के दौरान महिलाएं पूजा के बाद हवन करने लगीं।
उस पेड़ पर मधुमक्खी का छत्ता था। जैसे ही धुआं ऊपर उठा, मधुमक्खियां उड़ने लगीं। देखते ही देखते नीचे पूजा कर रहीं महिलाओं पर मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर दिया।
इससे वहां अफरातफरी मच गई। सभी इधर-उधर भागने लगे। करीब एक दर्जन महिलाओं को मधुमक्खियों ने काट लिया। उन्हें आनन-फानन में स्वजन इलाज कराने के लिए ले गए।
वहीं फतुहा में पूजा के दौरान बरगद के पेड़ में लपेटे गए धागे में आग लगने से अफरातफरी मच गई। हालांकि इसमें कोई जख्मी नहीं हुआ।
भरणी नक्षत्र में हुई बरगद की पूजा
सुहागिन महिलाओं ने शनिवार को ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या पर वट सावित्री व्रत किया। इस बार भरणी और कृत्तिका नक्षत्र के युग्म संयोग के साथ शनैश्चरी अमावस्या का विशेष संयोग रहा।
महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर उसकी परिक्रमा की। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा सुनी। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देवी सावित्री का वास होता है।
वट वृक्ष की पूजा के बाद अन्न, वस्त्र, ऋतुफल और मिष्ठान का दान करने से सुख-समृद्धि एवं पारिवारिक शांति की प्राप्ति होती है।
वट सावित्री पूजा के बाद महिलाएं बरगद के पेड़ को बांस के पंखे से हवा झला। इसके बाद अपने पति को भी उसी पंखे से हवा झला।
शास्त्रों में इसका विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि बांस वंश वृद्धि का प्रतीक होता है। विवाह सहित कई शुभ कार्यों में भी बांस की पूजा की जाती है।
जिस प्रकार बांस का पौधा तेजी से बढ़कर समूह का रूप लेता है, उसी प्रकार परिवार और वंश की वृद्धि की कामना इस परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।


