भागलपुर में स्थित विक्रमशिला सेतु के एक हिस्से के ध्वस्त होने की घटना सिर्फ एक पुल के टूटने तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग और निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है।
एक ओर जहां महज 25 साल पुराने विक्रमशिला पुल का हिस्सा गिर गया है, वहीं दूसरी ओर 1960 के दशक में बना कुरसेला का कोसी पुल आज भी भारी वाहनों का दबाव झेलते हुए यातायात को सुचारू बनाए हुए है।
यह तुलना खुद-ब-खुद सवाल खड़े करती है, क्या आधुनिक तकनीक के बावजूद निर्माण की गुणवत्ता में कमी आई है? या फिर बढ़ते भ्रष्टाचार ने बुनियादी ढांचे को कमजोर कर दिया है?
साथ ही मंथन की आवश्यकता पर बल दे रही कि आधुनिक तकनीक, उन्नत मशीनरी और बड़े बजट के बावजूद नए पुल अपेक्षा के अनुसार टिकाऊ साबित क्यों नहीं हो रहे, जबकि पुराने पुल आज भी मजबूती से खड़े हैं।
बहरहाल, इसका जवाब निर्माण गुणवत्ता, डिजाइन मानक और निगरानी प्रणाली की गंभीर समीक्षा के बाद ही निकल कर सामने आ सकता है।
वाहनों का बढ़ता गया दबाव पर पार लगा रहा कोसी पुल
1960 के दशक में जहां 10 से 12 टन क्षमता वाले ट्रक आम थे, वहीं आज 50 से 55 टन तक के भारी वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
राष्ट्रीय राजमार्ग 31 सामरिक और व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है, जो पूर्वोत्तर भारत जैसे गुवाहाटी से जोड़ता है।
ऐसे में इस मार्ग पर लगातार भारी वाहनों का दबाव भी बना रहता है। बावजूद कोसी पुल अपने क्षमता से कई गुना अधिक भार का दबाव झेलकर भी वाहनों को सकुशल पार करा रहा है।
पुराने पुल की मरम्मत से चल रही व्यवस्था
कुरसेला स्थित कोसी पुल पर समय-समय पर मरम्मत कार्य होता रहा है। 2019 में इसके एक पिलर के धंसने की घटना ने इसकी मजबूती पर सवाल जरूर खड़े किए थे, लेकिन इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा नियमित मरम्मत और निगरानी से इसे चालू रखा गया है। हालांकि, स्थानीय लोग मानते हैं कि इतने पुराने पुल पर सावधानी बरतना जरूरी है।
युद्धकालीन जरूरत के लिए बना था कोसी पुल
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना की रसद आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए इस पुल का निर्माण कराया गया था। यह पुल कोसी नदी के उस हिस्से पर बना है, जहां नदी का संगम गंगा से होता है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उस दौर की इंजीनियरिंग की एक मजबूत संरचना आज भी अपनी उपयोगिता साबित कर रही है।


