एक हलवाई की गलती से बना था ओडिशा का मशहूर छेना पोड़ा, दिलचस्प है भगवान जगन्नाथ के प्रिय भोग की कहानी

 ओडिशा का जिक्र हो और छेना पोड़ा का नाम जुबान पर न आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है। भगवान जगन्नाथ को भोग लगने वाली यह मिठाई अपने खास सोंधे स्वाद के लिए मशहूर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओडिशा के फूड कल्चर का अहम हिस्सा बन चुकी यह डिश असल में एक गलती का नतीजा थी?

जी हां, यह कोई मास्टर शेफ की रेसिपी नहीं, बल्कि एक इत्तेफाक से बनी मिठाई है, जो अब ओडिशा की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है। आइए जानते हैं कि आखिर पहली बार कैसे बना था लाजवाब छेना पोड़ा।

एक रात की कहानी और नयागढ़ का वह हलवाई

छेना पोड़ा की उत्पत्ति 20वीं सदी में ओडिशा के नयागढ़ शहर में हुई थी। इस मिठाई को बनाने श्रेय वहां एक स्थानीय मिठाई की दुकान के मालिक सुदर्शन साहू को जाता है।

कहा जाता है कि एक रात सुदर्शन साहू के पास काफी मात्रा में छेना बच गया था। उन्होंने उसे फेंकने के बजाय उसमें चीनी और कुछ सीजनिंग्स के उस मिश्रण को एक गर्म ओवन में रख दिया, जो दिनभर के काम के बाद अभी भी थोड़ा गर्म था।

रातभर वह मिश्रण उसी ओवन में रहा। अगली सुबह जब उन्होंने ओवन खोला, तो वह एक लाजवाब मिठाई देखकर हैरान रह गए। इस तरह जन्म हुआ छेना पोड़ा का, जिसे आज ओडिशा का स्वाद कहा जाता है।

कैसे मिला यह नाम

छेना पोड़ा का मतलब इसके बनने की प्रक्रिया में ही छिपा है। ओडिया भाषा में छेना का मतलब है कॉटेज चीज और पोड़ा का मतलब है जला हुआ या भुना हुआ।

यह केवल एक मिठाई नहीं है, बल्कि हर ओडिया नागरिक के लिए एक भावना है। आज ओडिशा की हर मिठाई की दुकान पर इसकी भारी मांग रहती है, जहां इसे चीनी या गुड़ के अलग-अलग स्वादों में तैयार किया जाता है।

पारंपरिक विधि और अनोखा स्वाद

छेना पोड़ा को बनाने की विधि काफी दिलचस्प है। इसे बनाने में ताजा छेना, चीनी और सूजी का इस्तेमाल किया जाता है। इस मिश्रण को साल के पत्तों में लपेटा जाता है। साल के पत्ते इसे एक खास स्मोकी फ्लेवर और सुगंध देते हैं। इसे तब तक धीमी आंच पर बेक किया जाता है जब तक कि इसकी बाहरी परत सुनहरी भूरी और कुरकुरी न हो जाए।

धार्मिक महत्व और छप्पन भोग

अपने अनोखे और समृद्ध स्वाद के कारण छेना पोड़ा ने बहुत जल्द ही साधारण दुकानों से निकलकर मंदिरों तक का सफर तय कर लिया। आज यह पूरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग का हिस्सा बन चुका है। जल्द ही इस मिठाई को GI टैग भी मिलने वाला है, जो इसकी क्षेत्रीय पहचान को सुरक्षित रखने में अहम योगदान निभाएगा।

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