खेतों में पककर तैयार रबी की फसल और खरीफ सीजन की दहलीज पर खड़ा किसान आज एक अजीबोगरीब कशमकश में है। एक तरफ जहां हरियाणा के किसानों ने प्याज उत्पादन में रिकॉर्ड कायम किया है, वहीं दूसरी ओर हजारों मील दूर लाल सागर में उठती युद्ध की लहरों ने स्थानीय मंडियों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं।
निर्यात में बाधा और गिरती कीमतों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसान खरीफ सीजन में दोबारा प्याज बोने का जोखिम उठाएगा। वर्तमान में जो स्थिति बनी है, इसका सीधा असर अब स्थानीय मंडियों और किसानों की जेब पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
प्याज के मामले में हरियाणा देश के अग्रणी राज्यों को टक्कर दे रहा है। देश के कुल प्याज उत्पादन में हरियाणा की 3.4 प्रतिशत हिस्सेदारी है। हरियाणा में लगभग 22 से 24 हजार हेक्टेयर भूमि में प्याज की खेती की जा रही है।
करनाल, नूंह, गुरुग्राम, अंबाला और फतेहाबाद जैसे जिलों ने उत्पादकता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यहां 39.89 टन प्रति हेक्टेयर तक का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया है, जो कई राज्यों के राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है।
समुद्री माल ढुलाई में उछाल
ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह प्रभावित हुए हैं। जहाजों को अब लंबे रास्तों से होकर गुजरना पड़ रहा है, जिससे ईंधन और समय दोनों की खपत बढ़ गई है। समुद्री माल ढुलाई का किराया 8 से 9 हजार डॉलर प्रति कंटेनर तक बढ़ गया है। ढुलाई महंगी होने के कारण भारत से होने वाला कृषि निर्यात वैश्विक बाजार में महंगा हो गया है, जिससे विदेशी खरीदार कम हो रहे हैं।
खाड़ी देशों को राहत
देने की कवायद खाड़ी देशों में जारी तनाव ने प्याज के निर्यात और कीमतों के गणित को भी बिगाड़ दिया है। यूएई और अन्य खाड़ी देशों में प्याज की किल्लत को देखते हुए सरकार अब रणनीतिक कदम उठा रही है। केंद्र सरकार सप्लाई चेन को बहाल करने और मित्र देशों को राहत देने के लिए लगभग 50,000 टन अतिरिक्त प्याज निर्यात करने का प्रयास कर रही है।
बड़ी चुनौती: सप्लाई चेन टूटी तो मंडियों में आएगी मंदी
निर्यात बाधित होने का सबसे बड़ा डर रबी की फसल के स्टाक को लेकर है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक माल नहीं पहुंचा, तो रबी सीजन का भारी स्टाक घरेलू मंडियों में ही डंप हो जाएगा। आवक बढ़ने और मांग कम होने की स्थिति में कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है।


