जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 2013 ड्रग्स केस में सरकार को दी क्लीन चिट, लेकिन चेतावनी- ‘लापरवाही पर दोबारा खुलेगा मामला’

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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने ड्रग्स के बढ़ते खतरे को लेकर वर्षों से चल रहे स्वत संज्ञान (सुओ मोटू) मामले को बुधवार को बंद कर दिया। कोर्ट ने यह फैसला तब लिया जब सरकार ने पूरे केंद्र शासित प्रदेश में नशे के खिलाफ चलाए जा रहे व्यापक अभियान की विस्तृत जानकारी पेश की।

यह मामला वर्ष 2013 में कोर्ट द्वारा खुद संज्ञान लेते हुए दर्ज किया गया था और एक दशक से अधिक समय तक विचाराधीन रहा। चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने माना कि समय-समय पर दिए गए निर्देशों के बाद अब सरकार ने ठोस और व्यापक कदम उठाए हैं।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील मोनिका कोहली ने बताया कि गृह विभाग द्वारा दायर हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस सभी जिलों में सक्रिय होकर नशीले पदार्थों के निर्माण, तस्करी, बिक्री और सेवन पर सख्ती से कार्रवाई कर रही है।

सरकार के नशा विरोधी अभियान को बताया संतोषजनक

सरकार ने यह भी बताया कि रणनीति केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जागरूकता अभियान, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और नशा मुक्ति व पुनर्वास जैसे कदम भी शामिल हैं, ताकि समाज को इस बुराई से बचाया जा सके।

न्यायालय ने सरकार की व्यापक और बहुआयामी कार्रवाई को संतोषजनक मानते हुए मामले को फिलहाल समाप्त कर दिया। हालांकि, यह स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में स्थिति बिगड़ती है या अधिकारियों की ओर से लापरवाही सामने आती है तो इस मामले को दोबारा खोला जा सकता है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता दीपिका महाजन द्वारा दिए गए सुझावों पर भी सरकार ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए उन्हें लागू करने पर विचार करने का आश्वासन दिया।

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