बलूचिस्तान की पीड़ा: गुमशुदा लोग, संसाधनों का दोहन और बढ़ता प्रतिरोध

 रेगिस्तान की उस अनंत पसरी हुई चुप्पी में, जहां हवा भी इतिहास की धूल लेकर चलती है, एक भूमि है बलूचिस्तान। पहाड़ों की कठोरता, रेत की तपिश और मनुष्यता की मौन वेदना, यहां सब एक साथ सांस लेते हैं।

एक विस्तृत मरुस्थल, दूर-दूर तक फैली पर्वतमालाएं, ऊंटों की धीमी चाल, लोकगीतों की लय और जनजातीय जीवन की जड़ें, जो हजारों वर्षों में धरती के साथ गुंथ गई हैं। यह वही धरती है जहां कभी मेहरगढ़ जैसी आदिम सभ्यता फली-फूली, जहां मनुष्य ने पहली बार खेती के बीज बोए, जहां मिट्टी ने मनुष्य को जीवन का पहला व्याकरण सिखाया। यहां की रेत में इतिहास दबा नहीं है, धड़कता है…

फिर समय बदला…
कारवां आए, साम्राज्य आए, कभी फारस की छाया पड़ी, कभी अरब की आहट आई, पर बलूच अपनी पहचान में अडिग रहा, स्वाभिमान उसका संस्कार था, स्वतंत्रता उसका स्वभाव।

और फिर 20वीं सदी के उस निर्णायक मोड़ पर, जब दुनिया आज़ादी की सांस ले रही थी, बलूचिस्तान की नियति को भी एक मोड़ मिला।

1947 के बाद… वह क्षण आया, जब इतिहास ने करवट ली और एक स्वतंत्र इकाई को, धीरे-धीरे, दबाव और निर्णयों की धुंध में, दुर्दांत पाकिस्तान के अधीन कर दिया गया।

यह समावेशन नहीं था, यह एक मौन मोड़ था, जहां सहमति की जगह सन्नाटा था। और यहीं से शुरू होती है वह दर्द की रक्तरंजित कहानी… जो आज तक खत्म नहीं हुई।

धूल भरी सड़कें
सैन्य चौकियां
डरी हुई आंखें…
किसी घर का दरवाज़ा अचानक खुलता है, अंदर से एक माँ की चीख उठती है कि उसका बेटा रात के अंधेरे में उठा लिया गया है। कोई मुकदमा नहीं, कोई सूचना नहीं, बस एक शब्द
‘गुमशुदा’। यह शब्द अब वहां केवल शब्द नहीं रहा। यह एक व्यथा का व्याकरण बन चुका है।

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