तीखी बहस में केवल अपशब्दों का प्रयोग अश्लीलता का अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण में कहा है कि तीखी बहस के दौरान केवल अपमानजनक या अपशब्दों (जैसे ‘बास्टर्ड’) का उपयोग करना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294(बी) के तहत ‘अश्लीलता’ का अपराध नहीं माना जाएगा।

अश्लीलता की व्याख्या और कानूनी दायरा जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी शब्द को ‘अश्लील’ तभी माना जा सकता है जब वह व्यक्ति के भीतर कामुकता या यौन उत्तेजना पैदा करने की प्रवृत्ति रखता हो।

गाली-गलौज वाले शब्द आम: SC

कोर्ट ने कहा, ‘आज के आधुनिक युग में तीखी बातचीत के दौरान गाली-गलौज वाले शब्द आम हो गए हैं। केवल अपमानजनक या अरुचिकर होने से कोई शब्द आपराधिक अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आ जाता।’

कोर्ट के अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट ने गाली-गलौज को अश्लीलता मानकर गलती की थी। मामले की पृष्ठभूमि और सजा में कटौती यह मामला तमिलनाडु में साल 2014 में दो करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इस विवाद में एक व्यक्ति की सिर में चोट लगने से मौत हो गई थी।

क्या था पूरा मामला?

कोर्ट ने पाया कि हमला अचानक हुए झगड़े के दौरान ‘आवेश’ में किया गया था और हमलावर ने मौके पर पड़े लकड़ी के लट्ठे से केवल एक वार किया था, न कि किसी खतरनाक हथियार से।

इस आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपित की सजा को धारा 304 भाग द्वितीय (गैर-इरादतन हत्या) के तहत पांच साल से घटाकर तीन साल के कठोर कारावास में बदल दिया।

सह-आरोपित और साझा इरादे पर स्पष्टता दूसरे आरोपित के संबंध में, कोर्ट ने गैर-इरादतन हत्या की सजा को रद कर दिया। पीठ ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उसका इरादा जानलेवा चोट पहुंचाने का था।

हालांकि, हथियार से चोट पहुंचाने के लिए धारा 324 के तहत उसकी सजा बरकरार रखी गई, लेकिन उसे ‘पहले से काटी गई जेल की अवधि’ तक सीमित कर दिया गया। कोर्ट ने मुख्य दोषी को शेष सजा काटने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

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