पीड़ा सहन हो जाती है, उपेक्षा और तिरस्कार नहीं। कई बार खुद से सवाल करते थे कि आखिर हमारा कसूर क्या है? हमारे माता-पिता ने आतंकियों का क्या बिगाड़ा था, जो उन्हें मार दिया गया या बम धमाके में उड़ा दिया गया।
सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए थी, लेकिन हमें यूं उपेक्षित किया गया, जैसे हम अछूत हों, समाज पर बोझ हों। खैर, रात जितनी अंधेरी होती है, सुबह उतनी ही खुशगवार होती है और यही अब हो रहा है।’ अपने परिवार पर हुए अत्याचार की कहानी सुनाते हुए मौलवी रफीक अहमद ने कहा।
जम्मू संभाग के जिला रामबन के सुंबड़ से आए मौलवी रफीक अहमद ने कहा कि मेरे परिवार में मेरी बहन, जीजा, चचेरा भाई और फूफी समेत दो दर्जन सदस्य आतंकियों के हमलों में बलिदानी हुए। मुझे खुद अपनी जान बचाने के लिए गांव से पलायन करना पड़ा।
आतंकियों के कारण बेसहारा हुए मेरे भांजे मोहम्मद शफीक को आज न्याय मिला है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के कारण आज उसे सरकारी नौकरी मिली है। मेरी बहन ने बहुत मुश्किल से उसे पाला है। उसके पिता को आतंकियों ने करीब 20 साल पहले मार दिया था।
पिता को आतंकियों ने मारा और मैं सिस्टम से हारा
मोहम्मद शफीक ने कहा कि मैं चार-पांच साल का था, मेरे पिता शकील रामबन में पुलिस में बतौर एसपीओ थे और आतंकरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। यही आतंकियों को रास नहीं आया और एक दिन उन्होंने हमारे घर पर धावा बोला। मेरे पिता अकेले ही थे, आतंकियों ने उनके पेट में गोली मारी और वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
मैं पिछले चार साल से नौकरी के लिए भटक रहा था, कभी दिहाड़ी लगाता था, कभी किसी दुकान पर काम करता था। सरकारी दफ्तरों में भी चक्कर लगाए, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। मेरी मां जो पहले ही सिस्टम से हार गई थी, बोली-हमारी कोई नहीं सुनेगा। आज मैं यहां उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का शुक्रिया करूंगा कि उन्होंने मुझ जैसे और भी कई लोगों की जिंदगी को एक नयी उम्मीद दी है।
मां का गला काटा-पिता को गोली मारी, यतीमखाने में कटा बचपन
राजौरी के ददासन से आए इबरार अहमद ने कहा कि 25 साल पहले आतंकियों ने हमारे घर पर धावा बोला था। हमारे घरवालों ने उन्हें खाना नहीं दिया था, हम उनका विरोध करते थे। उन्होंने मेरी मां का गला काट दिया। फिर हमारे माल-मवेशी को एक कमरे में बंद कर आग लगा दी। घर के अन्य लोगों ने किसी तरह अपनी जान बचाई। मैं तब लगभग दो साल का था। उसके बाद वर्ष 2001 में आतंकियों ने मेरे पिता को भी गोली मार दी।
मुझे मेरे नाना अपने घर ले गए, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं थी। उन्होंने छह-सात साल मुझे अपने पास रखा। फिर मुझे वर्ष 2008 में श्रीनगर के यतीम ट्रस्ट में भेज दिया, वहीं मैंने पढ़ाई की। जब मैं किसी को बताता था कि मेरे मात-पिता आतंकी हमले में बलिदानी हैं तो वहां कई लोग दबे मुंह कहते थे कि कौम के गद्दार थे, इसलिए कत्ल किए गए।


