बिहार के निर्माण में मुजफ्फरपुर की विभूतियों का बड़ा योगदान, स्थापना दिवस पर याद किए गए महानायक

 बिहार अपने 115वें स्थापना दिवस का जश्न मना रहा है। इस अवसर पर राज्य के निर्माण और विकास में अहम भूमिका निभाने वाली विभूतियों को याद किया जा रहा है।

सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्र में मुजफ्फरपुर की धरती ने कई ऐसे महान व्यक्तित्व दिए, जिन्होंने बिहार की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

रामदयालु सिंह बने थे बिहार विधानसभा के पहले अध्यक्ष

मुजफ्फरपुर के गंगेया गांव में 1886 में जन्मे रामदयालु सिंह बिहार के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वाले नेताओं में शामिल रहे। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ ही वे 1936-37 के चुनाव में पुपरी-बेलसंड क्षेत्र से विजयी हुए।

26 जुलाई 1937 को उन्हें बिहार विधानसभा का पहला अध्यक्ष बनने का गौरव मिला। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात चंपारण आंदोलन के दौरान हुई थी। उनके प्रयासों से ही एमडीडीएम कॉलेज और रामदयालु सिंह महाविद्यालय की स्थापना संभव हो सकी।

श्याम नंदन सहाय ने संविधान निर्माण में निभाई अहम भूमिका

श्याम नंदन सहाय बिहार विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति रहे और उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी सेवा दी। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर पहले लोकसभा चुनाव में सांसद बने।

शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 1957 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। संविधान सभा में सक्रिय भागीदारी करते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राज्य पुनर्गठन के दौरान किशनगंज और पूर्णिया को बिहार में बनाए रखने में भी उनका अहम योगदान रहा।

विंध्येश्वरी प्रसाद वर्मा रहे सबसे लंबे समय तक विधानसभा अध्यक्ष

विंध्येश्वरी प्रसाद वर्मा, जिन्हें बिंदा बाबू के नाम से भी जाना जाता है, स्वतंत्र भारत में बिहार विधानसभा के पहले अध्यक्ष बने। वे 1946 से 1962 तक लगातार तीन कार्यकालों में इस पद पर रहे, जो अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल है।

महुआ क्षेत्र से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने वाले बिंदा बाबू स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने सामाजिक सुधारों, खासकर वंचितों के अधिकारों और मंदिरों में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उनके योगदान के लिए उन्हें 1961 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

मुजफ्फरपुर की इन महान विभूतियों का योगदान न केवल जिले बल्कि पूरे बिहार के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज भी उनके कार्य और विचार नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।

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