सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छंटा नहीं है। बीजापुर के घने जंगलों में महुए की गंध तैर रही है, ओस से भीगी घास पर आदिवासी महिलाओं के कदम महुआ बीनते हुए आगे बढ़ रहे हैं, तभी इस सन्नाटे को एक साफ लेकिन धीमी आवाज चीरती है- क ख ग यह किसी साधारण गांव से निकल रही आवाज नहीं है, बल्कि कभी माओवादियों की फैक्ट्री कहे जाने वाले बीजापुर के पेद्दाकोरमा की है, जहां पांच दशक तक बंदूक की गूंज ही पहचान थी।
अब से कुछ माह पहले तक यहां एक झोपड़ी में माओवादी पाठशाला चलती थी, जहां बच्चों को अक्षर नहीं, बारूद और बंदूक की भाषा सिखाई जाती थी। आज उसी जमीन पर सरकारी स्कूल की दीवारों से ककहरा की आवाज गूंज रही है।
इस बदलाव के केंद्र में हैं गांव के युवा विकेश कोड़मे जैसे ‘शिक्षादूत’, जिन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को जोड़ा, भरोसा जगाया और स्कूल तक पहुंचाया।
शुरुआत पेड़ों के नीचे और झोपडि़यों से हुई, अब पक्के स्कूल खड़े हो रहे हैं। इसी तरह भट्टीगुड़ा में जहां कभी माओवादियों का स्मारक डर की पहचान था, अब स्कूल की घंटी गूंजती है।
अंदरूनी इलाकों के 263 स्कूलों में फिर बजी घंटी
पेद्दाकोरमा, भट्टीगुड़ा, तुषवाल और गुण्डापुर जैसे अंदरूनी इलाकों में माओवादी हिंसा के दौर में 300 से अधिक स्कूल या तो बंद करा दिए गए या ध्वस्त कर दिए गए।
2019 में शुरू हुए स्कूल खोलो अभियान के साथ प्रशासन जब गांवों तक पहुंचा, तो सबसे बड़ी चुनौती इन्हें फिर से जीवित करना था। आज 263 स्कूल फिर से खुल चुके हैं, जहां 9,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई करते हैं। साथ ही करीब 100 नए स्कूल भवन निर्माणाधीन हैं।


