पंजाब विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं और फतेहगढ़ साहिब सीट पर कांग्रेस के भीतर दावेदारी की दौड़ तेज हो गई है। बीते तीन दशकों में बीस साल कांग्रेस ने यहां जीत हासिल की है। 2022 में आम आदमी पार्टी से मिली हार के बाद कांग्रेस इस हलके में दोबारा जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। बैठकों, प्रदर्शनों और इंटरनेट मीडिया पर पोस्टों को लेकर कांग्रेस चर्चा में बनी हुई है।
हाल ही में जिला कांग्रेस की एक संगठनात्मक बैठक हुई जिसमें पूर्व विधायक कुलजीत सिंह नागरा और पूर्व कैबिनेट मंत्री काका रणदीप सिंह नाभा प्रमुख रूप से शामिल हुए। बैठक में अधिकतर वे नेता मौजूद थे जिन्हें नागरा खेमे का माना जाता है। यह बैठक चुनावी माहौल में संगठनात्मक मजबूती के लिये बुलाई गई थी। बैठक के बाद पूर्व विधायक नागरा व पूर्व कैबिनेट मंत्री काका रणदीप की अगुवाई में एलपीजी गैस की किल्लत को लेकर प्रदर्शन किया गया था।
टिकट के अन्य दावेदार ईश्वरप्रीत सिंह सिद्धू जो एनएसयूआई पंजाब के प्रधान हैं, जिला कांग्रेस के वाइस-प्रधान बलिहार सिंह सिद्धू जो ब्लॉक समिति और जिला परिषद के चुनाव लड़ चुके हैं और वरिष्ठ नेता मनजीत शर्मा इस बैठक में शामिल नहीं हुए। जिला प्रधान सुरिंदर सिंह रामगढ़ का कहना है कि बैठक के लिये जिला कांग्रेस के पदाधिकारियों को सूचना दी गई थी। दूसरी ओर दावेदारों का कहना है कि उन्हें जानकारी नहीं मिली। इस विरोधाभास ने संगठन के भीतर संवाद और समन्वय के सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठकों और प्रदर्शनों के इस दौर से अलग इंटरनेट मीडिया पर दावेदारी की जंग तेज है। ईश्वरप्रीत सिंह सिद्धू ने पहले राहुल गांधी के साथ और अब पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल के साथ तस्वीरें साझा करके फतेहगढ़ साहिब सीट से अपनी दावेदारी ठोकी है। वहीं, नागरा खेमे से उनके बेटे कुलमनवीर सिंह नागरा की एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रधान विनोद जाखड़ के साथ तस्वीर सामने आई है। इन तस्वीरों को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
जमीनी रणनीति में भी अंतर दिख रहा है। कुलजीत सिंह नागरा लगातार सड़क पर सक्रिय हैं। वे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ राज्य सरकार और मौजूदा विधायक की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं और एलपीजी की कमी जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके उलट ईश्वरप्रीत, बलिहार और मनजीत ग्रामीण इलाकों में उन परिवारों और कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहे हैं जिनकी किसी कारण से नागरा से दूरी बनी हुई है। उनका जोर नागरा से नाराज चल रहे खेमे को अपने पक्ष में लामबद्ध करने पर है।
बीते तीन दशकों में हुए छह विधान सभा चुनावों में चार चुनाव कांग्रेस ने जीते। साल 1997 और 2002 में कांग्रेस से डा. हरबंस लाल ने जीत हासिल की। साल 2007 में शिअद के टिकट से दीदार सिंह भट्टी ने जीत दर्ज की। इसके बाद आए 2012 के चुनावों में कांग्रेस को बगावत का सामना करना पड़ा। टिकट के दावेदार पूर्व मंत्री डा. हरबंस लाल और तत्कालीन कांग्रेस जिला प्रधान लखबीर सिंह राय ने टिकट न मिलने पर पार्टी छोड़ दी।


