ईद से पहले कश्मीर घाटी में मटन की कीमतों में उछाल, 740 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंचा भाव

 ईद का पर्व आने से पहले घाटी में मटन की कीमतों में एक बार फिर उछाल आया है। आल कश्मीर बूचड़ यूनियन ने खुदरा भाव 740 रुपये प्रति किलोग्राम तय किया है।

यह घोषणा क्षेत्र में मांस की बढ़ती कीमतों को लेकर बढ़ती जन चिंता के बीच आई है, विशेषकर इसलिए क्योंकि मटन कश्मीरी घरों में एक प्रमुख खाद्य पदार्थ है। यूनियन ने कहा कि व्यापार जगत के भीतर आंतरिक विचार-विमर्श के बाद संशोधित दर तय की गई है।

संघ के अध्यक्ष खजिर मोहम्मद रेगू ने पुष्टि की कि नई दर को अंतिम रूप दे दिया  है और यह आज सोमवार से लागू हो गई है। संघ ने प्रशासन से खाद्य पदार्थों, जिनमें मटन भी शामिल है, कि स्वच्छता, गुणवत्ता, वजन और माप की निगरानी के लिए बाजार जांच दल को मजबूत करने का आग्रह किया।

इसने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए जम्मू और कश्मीर में मटन उत्पादन करने वाली भेड़ों की किस्मों के पालन-पोषण सहित पशुधन क्षेत्र में सरकार द्वारा अधिक निवेश करने की मांग की।

मटन की बढ़ती कीमतों से जनता निराश

इधर मटन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने ग्राहकों को निराश कर दिया है। अधिकांश ग्राहकों का कहना है कि ईद के इस पर्व पर जब पहले से ही बढ़ती महंगाई के चलते आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी करने में उनकी जेब हल्की हो रही हैं वहीं अब मांस की बढ़ती कीमतों के रूप में उनके सामने एक और चुनौती खड़ी हो गई है।

सैयद तजामुल नामक एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, बीते दो तीन बसरों के दौरान ही एक किलोग्राम गोश्त की कीमत 550- से बढ़कर अब 740 हो गई है। आप ही बताएं कि गरीब इसको खरीद पाएगा क्या? तजामुल ने कहा, गोश्त हमारे खाने का एक लाजमी हिस्सा है। तीज त्योहार हो या शादी समारोह, गोश्त जरूरी पकता है। लेकिन अब शायद ऐसा ना हो क्योंकि अब यह एक लक्जरी आईटम बन गया है और मुझे जैसे दिहाड़ी मजदूर इसे एर्फोड नही कर सकते।

गरीबों की पहुंच से दूर हुआ गोश्त

रुबीना नामक एक ग्रहणी ने कहा, हम जैसे गरीब लोग गोश्त कभी कभार ही पकाते हैं। क्योंकि महंंगा है। ईद पर इसके लिए हम अलग से बजट बना लेते थे। लेकिन इसकी कीमतों में और बढ़ोतरी होने के चलते अब शायद ईद पर भी हम इसका स्वाद नही ले पाएंगे। इद्रीस भट नामक एक व्यक्ति ने कहा,गोश्त हर दिन खाने वाली चीज नही है। हां लेकिन बीमार के लिए डॉक्टर रिकमेंड करते हैं ताकि इसके खाने से मरीजों को ताकत मिल सके।

ऐसे में गरीब लोग अपने दसतरख्वान(खाना खाने के लिए फर्श या मेज पर बिछाए जाने वाले कपड़े को दस्तरख्वान कहा जाता है) पर तो नहीं लेकिन घर में मरीज की थाली में गोश्त रख देते हैं। लेकिन अब शायद मरीजों की थाली भी इससे खाली ही रहेगी। इद्रीस ने कहा कि सरकार को इन बातों को ध्यान में रख गोशत की आए दिन बढ़ती कीमतों पर रोक लगाने के लिए कोई नीति अपनानी चाहिए।

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