हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक आपराधिक अपील को निर्णीत करते हुए में कहा है कि मात्र इसलिए कि एफआइआर दर्ज कराने के लिए तहरीर वकील की सहायता से तैयार की गई है, उसे झूठा नहीं माना जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने अपीलार्थी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, हालांकि उसकी सजा को कम कर दिया है।यह आदेश न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान व न्यायमूर्ति एके चौधरी की पीठ ने प्रतापगढ़ के जगदंबा हरिजन की अपील पर पारित किया है।
सत्र न्यायालय ने अपीलार्थी को दो महिलाओं पर एसिड हमले कर गैर इरादतन हत्या करने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपीलार्थी की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क था कि एफआइआर दो दिन बाद दर्ज की गई थी और वह भी एक वकील की सहायता से तैयार की गई थी, इसलिए यह रिपोर्ट असत्य है।
हालांकि न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एफआइआर का वकील की सहायता से तैयार होना उसकी विश्वसनीयता को अपने आप प्रभावित नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि जब कानूनी सहायता प्रत्येक आपराधिक प्रक्रिया में मान्य है, तब एफआइआर के समय सहायता लेना भी सामान्य बात है और इससे किसी भी तथ्य की सच्चाई पर संदेह नहीं किया जा सकता।
साक्ष्य के आधार पर देखा गया कि गवाहों के बयान, चिकित्सा और फोरेंसिक रिपोर्ट अभियोजन केस को सिद्ध करते हैं। हालांकि न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 14 वर्ष कारावास में बदल दिया। न्यायालय ने पाया कि अपीलार्थी 13 साल 9 महीने 24 दिन जेल में बिता चुका है।


