बलिया नाला के जरिये रिंहद जलाशय में मिलाया जा रहा NCL दुधिचुआ परियोजना का दूषित पानी? जिम्मेदार मौन क्यों?

3.6kViews
1890 Shares

सिंगरौली/दुधिचुआ।Northern Coalfields Limited (NCL) की दुधिचुआ परियोजना एक बार फिर पर्यावरणीय सवालों के घेरे में है। आरोप है कि खदान से निकलने वाला कोयला-युक्त दूषित पानी सीधे बलिया नाला में छोड़ा जा रहा है, जो आगे चलकर रिंहद जलाशय में मिल रहा है। इससे जलाशय के पानी की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण के जानकार लोगों का कहना है कि परियोजना द्वारा स्थापित एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) और जल शोधन संयंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं और अधिकांश समय बंद रहते हैं। नतीजतन बिना शोधन का गंदा पानी प्राकृतिक जल स्रोतों में बहाया जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

सिंगरौली को देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है, जहां बड़े पैमाने पर कोयला खनन और ताप विद्युत उत्पादन होता है। दुधिचुआ ओपनकास्ट खदान से प्रतिदिन भारी मात्रा में पानी बाहर निकाला जाता है, जिसमें कोयले के महीन कण, स्लरी, तेल-चिकनाई और अन्य रासायनिक अवशेष शामिल हो सकते हैं।

 

आरोप है कि यह पानी समुचित उपचार के बिना बलिया नाला में छोड़ा जा रहा है। बलिया नाला सीधे रिंहद जलाशय से जुड़ता है, जिससे दूषित जल अंततः जलाशय में पहुंच जाता है। रिंहद जलाशय दो राज्यो मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के लिए पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

 

एसटीपी प्लांट पर सवाल

परियोजना क्षेत्र में लगाए गए एसटीपी और सेडिमेंटेशन टैंक कागजों में तो सक्रिय दिखाए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में अधिकतर समय बंद रहते हैं। जब निरीक्षण की सूचना होती है, तभी प्लांट चालू किए जाते हैं। यह पर्यावरणीय मानकों और जल संरक्षण कानूनों का गंभीर उल्लंघन है। जिसपर किसी भी तरह की कार्यवाही भी नहीं होती?

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर प्रश्न

मामले में दोनों राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं:

  • Madhya Pradesh Pollution Control Board पर आरोप है कि वह केवल औपचारिक जांच कर खानापूर्ति कर रहा है।
  • Uttar Pradesh Pollution Control Board पर भी इसी प्रकार की लापरवाही के आरोप हैं।

जानकार लोगों का कहना है कि यदि नियमित जल नमूना परीक्षण और पारदर्शी रिपोर्टिंग हो, तो सच्चाई सामने आ सकती है। लेकिन अब तक किसी भी बोर्ड ने सार्वजनिक रूप से विस्तृत परीक्षण रिपोर्ट जारी नहीं की है। कुछ समय पर जांच में उत्तर प्रदेश से पहुंची टीम भी केवल खाना पूर्ति करके चली गई उस टीम ने कम्पनी के इशारे पर जांच रिपोर्ट तैयार की जबकि सबको दिख रहा है कि इतने बड़े नाले के माध्यम से दूषित पानी रिहंद जलाशय में मिलाया जा रहा है।

संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभाव

विशेषज्ञों के अनुसार, खदान से निकलने वाले पानी में निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं:

  • उच्च स्तर का सस्पेंडेड सॉलिड (TSS)
  • भारी धातुओं की उपस्थिति
  • जल में ऑक्सीजन की कमी
  • जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव

रिंहद जलाशय के प्रदूषित होने से:

  • पेयजल गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है
  • मछलियों की संख्या घट सकती है
  • किसानों की फसलों पर असर पड़ सकता है
  • स्थानीय आबादी में त्वचा और पेट संबंधी रोग बढ़ सकते हैं

 

NCL का पक्ष?

समाचार लिखे जाने तक Northern Coalfields Limited की ओर से इस आरोप पर कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है। कंपनी आमतौर पर यह दावा करती रही है कि वह पर्यावरणीय मानकों का पालन करती है और जल शोधन की समुचित व्यवस्था रखती है।

 

आपको बता दे कि दुधिचुआ परियोजना से छोड़ा जा रहा दूषित पानी केवल एक नाले तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह दो राज्यों की जल सुरक्षा और लाखों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल है। अब देखना यह है कि संबंधित एजेंसियां और प्रशासन इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती दिखाते हैं।रिंहद जलाशय की सेहत पर उठे इन सवालों का जवाब प्रशासन और कंपनी दोनों को देना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *