देवघरा का महाशिवरात्रि मेला सिर्फ झूलों की चरमराहट, जलेबी की मिठास और भोलेनाथ के जयकारों तक सीमित नहीं है। यह मेला उन अनकही मानवीय कहानियों का भी साक्षी है, जहां गांव की सादगी में जीवन के सबसे बड़े फैसले चुपचाप तय हो जाते हैं। सुबह की धूप में शिवगंगा के किनारे लगे पीपल के पेड़ के नीचे बैठे कुछ बुजुर्ग, पास ही खड़ी सकुचाई सी युवती और थोड़ी दूरी पर नजरें झुकाए खड़ा एक युवक—बाहर से देखने वालों को यह दृश्य साधारण लग सकता है, लेकिन यही वह पल होता है, जब दो परिवारों की तक़दीर एक-दूसरे से जुड़ने लगती है।
झूले की भीड़ में रिश्तों की तलाश
अनुमंडल मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूर बसे देवघरा गांव में लगने वाला यह मेला हर साल गांव-गिरांव के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है। यहां आने वाले परिवार सिर्फ खरीदारी या मनोरंजन के लिए नहीं आते, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य को लेकर उम्मीदें भी साथ लाते हैं।
कोई मां चूड़ियों की दुकान पर खड़ी बेटी की नजरों में छिपे संकोच को पढ़ रही होती है, तो कोई पिता झूले के पास खड़े बेटे को दूर से निहारते हुए उसके लिए सही जीवनसाथी की कल्पना करता है।
बातों-बाटों में गांव, खेती, परिवार और संस्कारों का जिक्र होता है और यहीं से रिश्तों की नींव पड़ जाती है।
तीन लाख लोगों की भीड़, हजारों कहानियां
महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रतिदिन तीन लाख से अधिक श्रद्धालु इस मेले में पहुंचते हैं। पूर्वी छोर पर चाट-चाउमीन और मिठाइयों की खुशबू है, पश्चिम में लकड़ी के पलंग और कुर्सियों की दुकानें सजी हैं। बीच में झूले और चाय-पान की दुकानें हैं, जहां थकान के साथ बातचीत भी घुलती जाती है।
इसी भीड़ में कई परिवार अपने लाडले-लाडलियों को बिना शोर किए, बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे को दिखा देते हैं। न बैंड-बाजा, न मंच—बस भरोसा और गांव की परंपरा।
महाभारत से जुड़ी आस्था, आज का लोकजीवन
देवघरा का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। पहाड़ की लगभग 250 फीट ऊंचाई पर स्थित उच्चेश्वर नाथ महादेव मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ता है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां ठहरे थे और अर्जुन ने यहीं भगवान शिव की तपस्या की थी। आज उसी आस्था की छांव में ग्रामीण समाज अपनी परंपराओं को आगे बढ़ा रहा है—जहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है।


