माचिस के डिब्बे पर धुन, सिगरेट के पैकेट पर पंचम दा ने लिखा गाना; 65 साल बाद भी अमर है मोहम्मद रफी का ये गीत
संगीत और सिनेमा, ये संबंध अनूठा है और निराला है। जहां सिनेमा होगा, वहां संगीत का जिक्र जरूर होगा। कहते हैं कि कुछ धुनें कागजों पर नहीं, यादों की परतों और वक्त की सिलवटों पर लिखी जाती हैं। हिंदी सिनेमा का एक दौर वो था, जब धुनें दिलों को सुकून देने वाला काम करती थीं।
आज के ‘डिजिटल दौर’ में यकीन करना मुश्किल है कि उस वक्त एक ऐसा गाना बना, जो माचिस की तीली से निकलकर सिनेमा के रूहानी पर्दे तक पहुंचा। आइए जानते हैं दिल को छूने वाले उस ब्लॉकबसल्टर गाने के पीछे की दास्तां…
कैसे बना एस डी बर्मन का ये गाना?
आज जिस गाने की बात हम कर रहे हैं असल में वो कोई और नहीं बल्कि साल 1960 में आई फिल्म ‘काला बाजार’ का गाना ‘खोया-खोया चांद’ है। इस गाने को आपने खूब सुना होगा, इस पर खूब आप वाइब करते हुए नजर आए होंगे लेकिन असल में इस गाने के बनने के पीछे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है।


