गंगा दियारा की उपजाऊ मिट्टी पर तिलहन और दलहन की फसलें तेजी से फैल रही हैं। काला सोना कहे जाने वाले कलाई (उड़द) की जगह अब सरसों और मसूर ने ले ली है, जिससे किसानों की आमदनी में वृद्धि हुई है। बजट में तिलहन-दलहन पर विशेष ध्यान देने और सरकारी प्रोत्साहन से किसान उत्साहित हैं और खेती के रकबे में वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
बरारी-कुर्सेला सहित गंगा दियारा के लगभग एक हजार हेक्टेयर में सरसों और मसूर की फसलें उगाई जा रही हैं। क्षेत्र में गेहूं और मक्का के साथ-साथ तिलहन और दलहन की फसलें भी समुचित पैमाने पर उग रही हैं। वर्तमान में सरसों का बाजार भाव लगभग 7,000 रुपये प्रति क्विंटल और मसूर का लगभग 6,500 रुपये प्रति क्विंटल है। कम लागत में बेहतर उत्पादन ने किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है।
गंगा दियारा में पिछले तीन-चार वर्षों से कलाई (उड़द) की फसल प्रभावित रही, क्योंकि बाढ़ का पानी समय पर नहीं उतरता। किसानों ने इस कमी की भरपाई सरसों, मसूर, मटर, गेहूं और मक्का की खेती बढ़ाकर की है। बरारी प्रखंड में मखाना की खेती भी लगभग एक हजार हेक्टेयर में होती है। अधिकांश मखाना किसान खेतों के खाली होने के बाद सरसों की खेती करते हैं ताकि फरवरी माह के अंत तक मखाना की फसल शुरू की जा सके।
किसानों ने बताया कि तिलहन और दलहन की खेती की ओर झुकाव इसलिए बढ़ा है क्योंकि बाजार भाव स्थिर है और उत्पादन लागत कम है। दाल मिल और मंडी की उपलब्धता से उत्पाद को आसानी से बाजार में बेचा जा सकेगा। सरकार ने तिलहन-दलहन की फसलों के लिए अनुदान और बीज मुहैया कराए हैं। आगे मूंग के बीज का वितरण भी योजना अनुसार किया जाएगा। मंडी भाव और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के संतुलन से किसानों को खेती में जोखिम नहीं है और आय के स्थिर स्रोत के रूप में यह फसल भरोसा देती है।


