जिस युवा शक्ति के बल पर भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने की क्षमता रखता है, वही युवा पीढ़ी आज नशे के दल-दल में तेजी से धंसती जा रही है। मौजूदा समय में किशोरों और युवाओं में नशे की लत चिंताजनक स्तर तक बढ़ चुकी है, जो न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर रही है, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
आज नशा केवल शराब, सिगरेट, गुटखा या खैनी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि स्मैक, ब्राउन शुगर, गांजा, सनफिक्स, अफीम और चरस जैसे घातक नशीले पदार्थ युवाओं की पहुंच में आ चुके हैं। इन नशों का सीधा असर युवाओं की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्थिति पर पड़ रहा है। पढ़ाई, करियर और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भटकते युवा धीरे-धीरे अपराध, अवसाद और हिंसा की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
भारतीय समाज में नशे को सदैव बुराइयों का प्रतीक माना गया है, लेकिन विडंबना यह है कि आज शराब पीना और सिगरेट का सेवन फैशन और स्टेटस सिंबल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सोशल मीडिया, फिल्मों और आधुनिक जीवनशैली ने नशे को सामान्य व्यवहार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है, जो अत्यंत खतरनाक संकेत है।
शराब और नशीले पदार्थों का सेवन मानव विवेक को नष्ट कर देता है। व्यक्ति सही और गलत, हित और अहित में फर्क करना भूल जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा था कि शराब का सेवन मनुष्य के शरीर और बुद्धि के साथ-साथ उसकी आत्मा का भी नाश कर देता है। यह कथन आज के संदर्भ में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
यदि समय रहते परिवार, समाज और सरकार इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो नशे की यह प्रवृत्ति आने वाले वर्षों में एक सामाजिक महामारी का रूप ले सकती है। युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता, शिक्षा, खेल, रोजगार और सख्त कानून—इन सभी मोर्चों पर एक साथ प्रयास करना अनिवार्य है।
युवा पीढ़ी केवल आज का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का आधार है। यदि यही पीढ़ी नशे में खो जाएगी, तो विकसित भारत का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

