गंभीर मरीजों तक ड्रोन से खून पहुंचाने की योजना में देरी, लाभार्थियों का ‘इंतजार’ बढ़ा

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 सेक्टर-30 के चाइल्ड पीजीआई प्रबंधन की 150 किलोमीटर तक गंभीर मरीजों को ड्रोन से खून पहुंचने की योजना में ‘देरी’ से लाभार्थियों का इंतजार बढ़ गया है। संस्थान ने योजना के लिए बजट न मिलने की बात कही है।

योजना के पहले चरण में एजेंसी के पदाधिकारियों ने खून पहुंचाने के लिए मानको के पैरामीटर को बारीकी से जांचा था। मगर प्रक्रिया अभी तक कागजों में अटकी है। उम्मीद थी कि प्रोजेक्ट पर स्वीकृति मिलने के बाद दूर दराज के अस्पतालों में ब्लड भेजकर उसकी गुणवत्ता का परीक्षण किया जा सकेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन से खून भेजने के लिए तापमान नियंत्रित बाक्स, विशेष उड़ान योजना, परीक्षण किट, डेटा रिकार्डिंग सिस्टम और गुणवत्ता विशलेषण प्रयोगशाला तैयार की जानी थी। प्रोजेक्ट को परवान चढ़ने के लिए ड्रोन आपरेटर, तकनीकी टीम और लाजिस्टिक सपोर्ट के लिए भी अलग बजट की जरूरत है।

चाइल्ड पीजीआई में एक हजार क्षमता का रक्तकोष है। यहां थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया समेत रक्त संबंधी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हजारों बच्चों का इलाज होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा समेत कई राज्यों से बड़ी संख्या में बच्चे इलाज कराने पहुंचते हैं।
डॉक्टरों ने बताया कि मरीज ग्रामीण इलाकों से आते हैं, जहां उनके नजदीक अस्पताल तो होते हैं लेकिन, रक्त उपलब्ध न होने से गंभीर हालत में चाइल्ड पीजीआई आते हैं। इन समस्याओं को देखकर अस्पताल प्रबंधन ने प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया था।

देश के कई हिस्सों में पहले भी ड्रोन से रक्त परिवहन की सफल कोशिशें की जा चुकी हैं लेकिन, चाइल्ड पीजीआई की योजना इसीलि विशेष है कि इसमें न केवल रक्त भेजना था बल्कि एक से दो दिनों तक ब्लड को स्टोर कर उसकी गुणवत्ता पर वैज्ञानिक अध्ययन भी किया जाना था। रक्त को तापमान नियंत्रित बाक्स में रखकर ग्रामीण क्षेत्रों के आसपास में भेजा जाता।

साथ ही रक्त में प्लाज्मा, प्लेटलेट्स लाल एवं श्वेत रक्त कोशिकाएं आदि की गुणवत्ता की वैज्ञानिक स्तर पर जांच होनी थी। इसमें पता किया जाता कि लंबी दूरी और ऊंचाई पर ड्रोन उड़ान ब्लड के घटकों से हीमोग्लोबिन, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा, रेड सेल्स पर क्या होता है। संस्थान के निदेशक प्रो. डा. अरूण कुमार सिंह का कहना है कि ड्रोन से रक्त भेजने की योजना अभी अधूरी है। उसे विभिन्न एजेंसियों से मंजूरी मिलने में देरी हो रही है।

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