दिल्ली में सराय काले खां के बांसेरा पार्क में हॉट एयर बैलून की सवारी शुरू हो रही है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से सफल ट्रायल और DGCA की मंजूरी के बाद दिल्लीवासी 150–200 फीट की ऊंचाई तक हॉट एयर बैलून राइड का आनंद ले सकेंगे।
लेकिन इन सबके बीच एक आम सवाल भी उठता है, आखिर दिल्ली में हॉट एयर बैलून की सवारी कितनी सुरक्षित है। जहन में एक सवाल ये भी आता है कि क्या यह बैलून दिल्ली एयरपोर्ट से उड़न भरने या लैंड करने वाले एयरक्राफ्ट के रूट में आएगा? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब।
बैलून को सुरक्षित क्यों माना जा रहा?
DGCA की विशेष अनुमति और सख्त नियम
डीजीसीए ने बैलून उड़ाने की अनुमति सीमित अवधि और नियंत्रित ऊंचाई के साथ दी है। इसे भी जानते हैं।
अधिकतम ऊंचाई: 200 फीट
औसत ऑपरेटिंग ऊंचाई: 120–150 फीट
ये हॉट एयर बैलून रस्सियों से बंधा और फ्री-फ्लाइट नहीं हैं। इससे ये हर वक्त नियंत्रण में हैं।
ATC ने निर्धारित किया है निश्चित समय
हॉट एयर बैलून ATC के साथ समन्वय में ही उड़ाया जाएगा। उड़ान का समय तय रहेगा।
सुबह: 3–4 घंटे
शाम: 3–4 घंटे
ATC को यह पता रहेगा कि बैलून कितनी देर, किस ऊंचाई और किस स्थान पर है। इसलिए हवाई निगरानी के दायरे में यह पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
जमीन से बंधा रहेगा बैलून
यह फ्री फ्लाइंग बैलून नहीं है। चार भारी क्षमता वाली रस्सियां (प्रत्येक की क्षमता 7 टन) बैलून को जमीन से बांधे रखती हैं। इसका मतलब है कि इस बैलून की दिशा और ऊंचाई नियंत्रित रहेगी। हवा के साथ बह जाने का जोखिम नहीं है।
मौसम की निरंतर मॉनिटरिंग
बैलून उड़ाने के लिए निम्नलिखित कंडीशन अनिवार्य होती हैं।
- हवा की गति नियंत्रित (आमतौर पर 8–12 km/h से कम)
- बारिश या तेज हवा न हो।
- दृश्यता अच्छी हो।
- मौसम खराब होते ही उड़ान रद्द कर दी जाती है।
हॉट एयर बैलून के लिए भारत में लागू प्रमुख तकनीकी सुरक्षा नियम
DGCA (CAR Section 3, Series M) के अनुसार
- जरूरत पड़ने पर DGCA/ATC हवाई क्षेत्र में बैलून ऑपरेशन के लिए NOTAM जारी करता है, जिससे हर एयरक्राफ्ट को इसकी जानकारी रहती है।
- फायर सेफ्टी और गैस मॉनिटरिंग, बर्नर और फ्यूल सिस्टम की जांच, सिलिंडर प्रेशर टेस्ट, पायलट का लाइसेंस और मेडिकल फिटनेस का ध्यान रखा जाता है।
- पायलट की अनिवार्य योग्यता होती है। बैलून उड़ाने वाला पायलट प्रमाणित होता है और उसे मौसम पढ़ना, ऊंचाई नियंत्रित रखना और आपात स्थिति में बैलून को उतारने का पूरा प्रशिक्षण होता है।
- ऑपरेशन जोन की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। जहां बैलून होता है, वहां लोग नहीं होते हैं। बिजली की लाइन से दूर होता है। किसी इमारत से भी इसे दूर रखा जाता है।
बैलून और एयरप्लेन ऑपरेशन में जमीन-आसमान का फर्क
हवाई जहाज कितनी ऊंचाई पर आते हैं?
दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरने वाले अधिकांश विमान शहर की सीमा में आते समय कम से कम 2,500–3,000 फीट से नीचे नहीं उतरते हैं।
यह ऊंचाई हॉट एयर बैलून की अधिकतम ऊंचाई यानी 200 फीट से लगभग 15 गुना अधिक है। मतलब, एयरक्राफ्ट और बैलून के बीच हजारों फीट की दूरी रहती है।यह इलाका एयर रूट में नहीं आता
DDA और DGCA के अनुसार सराय काले खां और असिता–बांसेरा के यमुना किनारे का क्षेत्र व्यावसायिक विमानन रूट से काफी दूर है।
लैंडिंग एप्रोच लाइन मुख्य रूप से IGI के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी हिस्से से होती है, जबकि बैलून यमुना बेल्ट के पूर्वी हिस्से में बंधे हुए रस्सों पर उड़ाया जाएगा।बैलून और एयरप्लेन टकराने का खतरा क्यों लगभग शून्य?
- ऊंचाई का अंतर बहुत ज्यादा
- एयर रूट इस क्षेत्र से नहीं गुजरते
- बैलून जमीन से बंधा, अनियंत्रित उड़ान नहीं
- ATC और DGCA की निगरानी
- मौसम और सुरक्षा प्रोटोकॉल

