हिमाचल में फोरलेन परियोजनाओं का मलबा बना मुसीबत, पंडोह से गोबिंद सागर तक हर ओर मंडरा रहा तबाही का साया

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देवभूमि हिमाचल में राष्ट्रीय राजमार्गों और फोरलेन परियोजनाओं का विस्तार पर्यावरण और आम जनजीवन के लिए नासूर बन रहा है। पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, मलबे के अवैज्ञानिक निस्तारण और ढलानों की बढ़ती अस्थिरता ने क्षेत्र को भूवैज्ञानिक संकट में डाल दिया है। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को हिमाचल के नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर 682 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है।

पर्यावरण मंजूरी के अनिवार्य दायरे से मिली है छूट
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2013 से देशभर में फोरलेन परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी के अनिवार्य दायरे से छूट मिली है। हिमालय जैसे भूगर्भीय रूप से अत्यंत संवेदनशील प्रदेश में छूट का अनुचित लाभ उठाया जा रहा है। प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियां व वन्यजीव गलियारे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।

हजारों पेड़ कटे

कीरतपुर-मनाली फोरलेन की भेंट 237 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि और 45 हेक्टेयर गैर वन भूमि चढ़ गई। परवाणू-शिमला फोरलेन के लिए हजारों पेड़ कटे, जबकि पठानकोट-मंडी मार्ग पर 15,000 से अधिक पेड़ कट चुके हैं व कई प्रस्ताव कतार में हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1980 की मूल भावना के विपरीत परियोजनाओं के प्रस्तावों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जा रहा है।

मलबे से नदियां, बांध खतरे की जद में

समिति ने कैग की उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया है, जिसमें सामने आया है कि नदियों और खड्डों में मलबा फेंका जा रहा है। परवाणू-सोलन मार्ग पर चिह्नित 20 डंपिंग साइट में से जून 2016 तक मात्र तीन को ही मंजूरी मिली थी। उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद नदियों, नालों और गोबिंद सागर झील में निरंतर मलबा जा रहा है। ब्यास नदी का तल लगातार ऊंचा हो रहा है। इससे पंडोह बांध के गेटों के अवरुद्ध होने का खतरा पैदा हो गया है। लगभग 12.09 करोड़ रुपये की अटल टनल मलबा पुनर्वास योजना 13 साल बाद भी अधूरी है।

दरकते पहाड़ और सिहरते आशियाने

पहाड़ों की अवैज्ञानिक कटाई से कीरतपुर मनाली और परवाणू सोलन मार्गों पर भूस्खलन की दृष्टि से 44 स्थान बेहद खतरनाक हैं। सड़क धंसने के बाद अस्थायी तौर पर मलबा हटाकर यातायात बहाल किया जाता है। पठानकोट-मंडी फोरलेन पर कांगड़ा के कोटला में रेंज फारेस्ट आफिसर के कार्यालय और आवास के पास 30 मीटर ऊंची कटाई कर दी गई। एनएचएआइ की रिटेनिंग वाल से मलबा और पत्थर गिरने से कार्यालय शिफ्ट करना पड़ा।

शिमला की कैथलीघाट-ढली बाईपास परियोजना के तहत संजौली में बन रही जुड़वां टनल के ठीक ऊपर करीब 257 रिहायशी मकान हैं। सुरंग निर्माण के दौरान कंपन और तकनीकी खामियों से सात भवनों में दरारें आ चुकी हैं।

सुधार के लिए सीईसी और विशेषज्ञों के निर्देश

रिपोर्ट में सख्त कदम उठाने की सिफारिश की है। मलबा ढोने वाले वाहनों में जीपीएस ट्रैकिंग और तिरपाल से ढकना अनिवार्य किया जाए। हर पांच किलोमीटर में परियोजना, ठेकेदार का नाम और आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर के बोर्ड लगाए जाएं। निरीक्षण और निगरानी में राज्य लोक निर्माण विभाग के अनुभवी इंजीनियरों को प्रमुखता दी जाए जो क्षेत्र के भूगोल, मौसम और भूभाग से परिचित हों।

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